संदेश

क्या हुआ?

तकलीफ़ ये है कि कुछ कह नहीं सकते
कुछ कहें ये तकलीफ़ भी होती नहीं हमसे
घाव ताज़ा है गहरा है दर्द भी बहुत है
ऐसे में ज़ख्म की नुमाइश होती नहीं हमसे
अब कुछ न पूछना इतना ही बहुत है
बोल कुछ पाएँ ये हिम्मत होती नहीं हमसे

Hindi Poetry performance at Rangrez Toli

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1. दिन में आशिक़ी रात को काम करता हूँ
पागल हूँ बे सिर पैर के काम करता हूँ 
2. तुमसे कहजाने को क्या-क्या राग लगा के बैठा हूँ  दिल की आवारा गलियों में रात बिछा के बैठा हूँ

बिखरे ख़याल

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तुमसे बात करने के बाद
एक रख दिया था खिड़की के पास
कुछ को बुकशेल्फ़
दो-चार को फ़्रिज के ऊपर
और एक-आध टांग दिया था
कीरिंग लटकाने वाले कील पर
तुम्हीं ने कहा था अपना ख़याल रखना
सो जो जहाँ आता है
उसे वहीं रख देता हूँ
तुम आओ तो इन्हें बटोर के ले जाना
इधर-उधर हो गए तो बड़ी फ़जीहत हो जायेगी..

तुमसे बात करने के बाद
एक रख दिया था खिड़की के पास

प्यार बिन बुलाये कैंसर की तरह है!

प्यार बिना बुलाया कैंसर नहीं है। पहली बात ये कैंसर नहीं है। कैंसर फिर भी इंसान को जीना सीखा सकता है और इंसान जीता है ये जानते हुए कि वो मौत के रास्ते पर जा रहा है। प्यार की गली ये नहीं बताती कि उसका मुँह जहाँ खुलेगा वहाँ ज़िन्दगी मिलेगी या मौत। ये अंधी गली है। जहाँ आगे मौत भी है और ज़िन्दगी भी। प्रेम भाव में आप सबको गले लगा भी लेते हो, अब वो ज़िन्दगी हो या मौत। इस अंधी गली में जाना है तो पहले मन की आँखें ख़ोज लो, वो अँधेरे में भी देख सकती हैं। लेकिन उसे खोजने के लिए तुम्हें ख़ुदको देखना पड़ेगा अंदर से, वो तुमसे होगा नहीं। क्यूँकि तुम्हें इसके लिए पहले ख़ुदको बाहर से जानना होगा। बिना बाहर से जाने तुम अंदर जा ही नहीं सकते। ये जो शरीर है जो नष्ट हो जाएगा, दिन-ब-दिन क्षीण हो रहा है। क़तरा-क़तरा झड़ रहा है। ये क्या है? ये जिसके साथ तुम रात-दिन सो रहे हो, नहा रहे हो, पोषण दे रहे हो, सजा रहे हो, ये शरीर है। इसके व्यवहार करने की सीमा है और एक एक्सपायरी डेट है। जब तक है तब तक उपयोग-दुरुपयोग तुम्हारे हाथ में है। जैसा चाहे कर लो क्योंकि जब ये नष्ट हो जाएगा तब कोई तुमसे ये प्रश्न नहीं पूछेगा कि शरीर था तब…

असहिष्णुता

हिन्दू की बस्ती में मुसलमान डरा हुआ है
मज़हब की बस्ती में ईमान डरा हुआ है
शक़, फ़रेब और सियासत के चलते
हिंदुस्तान की धरती में इंसान डरा हुआ है।

पिता

पिता यूनिवर्स की तरह है
उसके भीतर की गहराई नापना
मुमकिन ही नहीं है
यूनिवर्स की तरह ही
वो अपने दामन में
सूरज की गर्मी, यूरेनस की सर्दी
जूपीटर के तूफ़ान और जाने कितने राज़
दबाए रखता है
पिता के रहते
सब अपनी-अपनी धुरी पर घूमते हैं
अपनी कक्षा में ही चक्कर लगाते हैं
कोई किसी से नहीं टकराता
और बिग-बैंग थ्योरी की तरह
पिता की पनाह में
सबका विस्तार जारी रहता है
भले ही रिलेटिविटी की थ्योरी
जनरेशन में टाइम डिफरेंस पैदा कर देती हो
लेकिन तमाम असमानताओं के बावजूद
पिता सबका बराबरी से ख़याल रखता है
क्योंकि उसकी नज़र में
सब उसकी ही ज़िम्मेदारी हैं.
पिता यूनिवर्स की तरह है...

विरोध के स्वर

आप अराजकता की बात करते हैं,
मैं सुधार की कोशिश करता हूँ,
आप शायद डरते हैं सरकार से
मैं डर का तिरस्कार करता हूँ,
आप जीते हैं आँख बचाकर सत्य से
मैं सत्य से दो-दो हाथ करता हूँ
आप बचते रहते हैं समस्याओं से
मैं उनका प्रतिकार करता हूँ
आप चाहते हैं सिर्फ़ बात छेड़ना
मैं युद्ध के लिए ललकारता हूँ
आप चाहते हैं मसीहा कलयुग में
मैं मसीहों का निर्माण करता हूँ