संदेश

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ईमेल

सुबह -सुबह एक ईमेल की दस्तक पर, जब इनबॉक्स खोला,
तो देखा, बहुत सारे स्पाम भी आये हैं,
सब्जेक्ट से आकर्षक थे सारे,
जो पहले भी थे आये,
हेडर देखा फुटर देखा,
पूरा मेल पढ़ कर देखा,
तो पता चला,
किसी के बैंक अकाउंट में, बहुत सारा पैसा था,
जिसे हांसिल करने के लिए मेरा सहारा चाहिए,
रकम तो इतनी थी कि जिसे आज तक मैंने सुना न था,
अचानक से याद आया कि,
अखबार में कुछ दिनों पहले,
ऐसे ही किसी ईमेल फ्रौड की खबर आई थी,
फिर भी लगा कि हर बार फ्रौड थोड़े ही होता है,
स्टार का टैग लगा कर अकाउंट साईन आउट कर दिया,
जब भी साईन इन करता,
तो बस उस मेल पर ही नज़र जाती,
दो हफ्ते बीत गए,
सोचा उस मेल का रेप्लाए किया जाये,
लेकिन उस दिन अखबार में फिर एक खबर आ गयी,
"ईमेल के ज़रिये फ्रौड करने वाला गिरफ्तार"
फ्रौड है शायद, फ्रौड ही होगा,
इस तरह इन्टरनेट पर अगर अमीर बनने की तरकीब होती,
तो भिखारी कटोरे की जगह, लैपटॉप लेकर घूमते.

मिज़ाज़

पिछले दो दिनों से, जब से मैं शहर लौट कर आया हूँ, बहुत कुछ बदल गया है. मौसम का मिज़ाज़ भी उनमें से एक है और इस बदले हुए मिज़ाज़ की वजह से ही तो मैं इतनी रात गए ऑफिस में बैठे ब्लॉग लिख रहा हूँ. अपने बहुत ही ख़ास दोस्त के साथ मूवी देखने गया था "अजब प्रेम की गज़ब कहानी". हालाँकि इससे पहले भी मैं भी ये मूवी देख चुका हूँ. पर आज मेरे दोस्त के कैट के इम्तिहान ख़त्म हुए तो उसके साथ जाना पड़ गया. मना करने का सवाल ही नहीं उठता, आखिर ख़ास जो ठहरा. मूवी देखते हुए उसने भी आज की पीढ़ी के बदले हुए मिजाज़ की बात कही. उसने कहा कि आज-कल की फिल्म्स में कहानी थोड़ी बदल गयी है, हीरो-हीरोइन अब एक-दूसरे प्यार नहीं करते. फिल्म की कहानी में शुरुआत से लेकर, आखिर के थोड़े पहले तक वो किसी और से प्यार करते हैं और फिल्म के ख़त्म होते-होते उन्हें एक-दूसरे से प्यार हो जाता है. आज की पीढ़ी का मिजाज़ भी कुछ ऐसा ही हो गया है शायद, वो किसी को प्यार करते-करते किसी और से प्यार कर बैठते हैं और फिर कहानी पूरी तरह से फ़िल्मी बन जाती है. फर्क इतना होता है कि फिल्म में कौन हीरो है और कौन हीरोइन, ये सबको मालूम होता है. ती…

इस्तीफा

Dear Sir,
पिछले कई महीनों में मैंने आपको अपनी व्यवसायिक समस्याएं व्यक्तिगत तौर पर बताने के बाद ही ई-मेल का सहारा लिया था. पर अब तक किसी तरह का ठोस समाधान मुझे नहीं दिया गया है. मौखिक तौर पर जो भी बातें अब तक सामने आयीं, जैसे कि - ऊपर वाले कुछ कर रहे हैं, ऊपर बात हुई है उन्होंने कहा है कि कुछ करते हैं. इत्यादि.  पर अब तक क्या हुआ है, कुछ भी जानकारी नहीं दी गयी है.  कुछ चीज़ें जो मैंने आपसे मांगी हैं, वो increment, appraisal, promotion और bonus हैं. कोई भी मेहनती, ईमानदार एवं कर्तव्यनिष्ठ कर्मचारी अपनी कंपनी से शायद इन्ही चीज़ों की मांग करता है. मैं ये पूछते-पूछते हताश हो चुका हूँ कि क्या कंपनी मेरे  लिए कुछ कर रही है, हाँ या न? कोई जवाब नहीं मिला है. और जवाब न मिलने से मनोबल लगातार गिर रहा है और मानसिक परेशानी भी बढ़ रही है. मानसिक तनाव के चलते मेरा व्यक्तिगत जीवन भी प्रभावित हो रहा है. इस परेशानी को बर्दाश्त करने की मुझमें हिम्मत बहुत है लेकिन अब मैं इसे और बर्दाश्त नहीं करना चाहता. अब मुझे ऐसा लगने लगा है कि मैं शुरू से लेकर अभी तक अपने कार्यों के अतिरिक्त जो कार्य (Company name) के लिए …

समझौता एक्सप्रेस!!!

हँसी आ रही है, बहुत जोर से. और क्यों न आये? काम ही ऐसा करने जा रहा हूँ. कैसा काम है, बाद में पता चल जायेगा आपको. पर पहले ये बता दूँ कि जिंदगी में कभी-कभी ऐसा वक़्त आता है जब आपको लगने लगता है कि अब समझौता करके नहीं चला जा सकता. अब चाहे बात नौकरी की हो या फिर रिश्तों की. समझौतों से लदी ज्यादातर चीज़ें बोझ बन जाता हैं. कुछ महीनों से इस समझौते की उहा-पोहं में खुद को खोता सा जा रहा था. इतनी बड़ी कीमत,  वो भी समझौता एक्सप्रेस चलाने के लिए. न, नहीं, नो, नेवर. आप एक अभिनेता हो सकते हैं, एक नेता हो सकते हैं, एक उद्योगपति हो सकते हैं, एक बड़े पद पर अधिकारी हो सकते हैं. लेकिन इन सबकी कीमत आपको खुद की पहचान खोकर चुकानी पड़े तो, हो सकता है आप सहमत भी हो जाएँ अगर कीमत अच्छी मिले. सच बताऊँ, कुछ दिन बाद आप भी ऊब जायेंगे जब महसूस होगा कि आप, आप नहीं रह गए हैं. रह गये हैं तो एक चलते-फिरते आदमी जो अपनी संस्था के निर्देशों का पालन, मुंह पर ऊँगली रखकर करता है या फिर आपको काम तब भी करना है जब करने का मन न हो. काम करने का मन दो ही स्तिथि में नहीं होता, एक जब आप खुद के काम से संतुष्ट न हो, दूसरा जब आप अपनी सं…

ऊब

आजकल लिखने का मन नहीं करता, और अगर मन होता भी है तो लिखने में वक़्त नहीं दे पाता. पूरी कोशिश कर रहा हूँ कि कुछ अच्छा लिखूं. पर अच्छा क्या होता है? क्या अच्छा लिखने से कुछ अच्छा हो सकता है? मतलब अगर मैं कुछ लिख रहा हूँ और आप उसे पढ़ रहे हैं तो क्या उस लेख पर टिप्पणी करने के बाद आप फुर्सत हो जाते हैं अपने कर्तव्य से ? खैर मेरी छोड़िये, मैं तो जो लिखता हूँ बकवास ही लिखता हूँ पर आप जो अखबार पढ़ते हैं, कुछ अच्छे न्यूज़ चैनल देखते हैं. क्या उनमें भी सबकुछ बकवास ही होता है? मेरे लिए कुछ ख़बरों को छोड़कर बाकी सबकुछ ठीक-ठाक होता है अखबार और न्यूज़ चैनल में. नेता अपना काम कर रहे हैं (मतलब वो खबर बनने की पूरी कोशिश करते हैं.) और पत्रकार अपना काम करते हैं (कुछ खबर लाते हैं, कुछ खबर दबा जाते हैं , कुछ खबर बनाते हैं और  कुछ खबर बनने ही नहीं देते.). बाकी बची हमारी आम जनता "the mango people", इनका काम सबसे ज्यादा कठिन होता है. पांच साल में एक बार नेता चुन लिया और अपने काम से लग गए. बहुत काम होता है आम जनता के पास, जैसे सुबह सोकर उठाना, अखबार खरीद कर पढना और चाय की चुस्कियां लेते हुए कहना...ये…

लव आज-कल - नहीं बदली तो इंसान की मैन्फेक्चारिंग

"वक्त बदला, ज़रूरतें बदलीं लेकिन नहीं बदली तो इंसान की मैन्फेक्चारिंग। दिल आज भी वैसे ही धड़कता है जैसा आज से कई सालों पहले लैला-मजनू, हीर-रांझा, सोनी-माहि-वाल के समय में धड़कता था। लव, लव ही रहेगा; चाहे आज हो या कल। "

लव-आजकल देखने के बाद यही ख्याल आया। खैर, जब आप इस फ़िल्म को देखते हैं तो आपको खासी मशक्कत करनी पड़ती है इसे समझने के लिए। क्योंकि फ़िल्म का डायरेक्शन इतना उम्दा नहीं है जितनी कि इम्तियाज़ अली से उम्मीद थी। जब वी मेट और लव आजकल, कहानी, म्यूजिक, डायरेक्शन और एक्टिंग इन सब मामलों में बहुत अलग हैं। हालाँकि दोनों फिल्म्स अपनी जगह पर हैं लेकिन दोनों के डायरेक्टर एक होने कि वजह से तुलना करना वाजिब है। क्योंकि जब आपका पहला मैच धमाकेदार हो तो दूसरे मैच से लोगों की उम्मीद बढ़ जाती हैं। वैसे ये ज़रूरी है कि जब आप इस फ़िल्म को देख रहे हो, तो पूरा ध्यान फ़िल्म पर होना बहुत ज़रूरी है। फ़िल्म का पहला ट्रैक "ये दूरियां" समझने के लिए आपको पूरी फ़िल्म देखनी पड़ेगी, बिलाशक गाना बहुत अच्छा है। इसके अलावा फ़िल्म के बाकी गाने ट्विस्ट, आहूँ-आहूँ, मैं क्या हूँ, थोड़ा-थोड़ा प्यार, च…

सच में तू बड़ा हो गया है...पहली किश्त

मैं ऑफिस जा रहा हूँ कुछ लाना है क्या? मैंने माँ से पूछा।माँ ने कहा " हाँ, नानी की दवाई और नाना-नानी के लिए टोस्ट और बिस्कुट, चाय के साथ लेने के लिए। गाँव भेजना है। मैंने हाँ में सर हिला दिया। माँ ने पूछा "पैसे दूँ?" मैंने कहा "हैं मेरे पास।" माँ मुस्कुरा दीं और बोली "बड़ा हो गया है तू" मैं कुछ नहीं बोला, मैं भी मुस्कुराया और बाइक उठाकर चल दिया। माँ के कहे हुए लफ्ज़ कान की दीवारों से टकराकर दिमाग के उसे कोने से जाकर टकरा गए, जहाँ कुछ यादें एक-दूसरे की गोद में सिमटी हुई थीं। उसी में से एक याद उठ खड़ी हुई और उसने आंखों की तरफ़ तेज़ी से दौड़ना शुरू किया, मैंने बाइक की रफ़्तार कम कर ली। अब तक वो याद मेरी आंखों में रफ़्तार पकड़ चुकी थी, और जहाँ से वो शुरू हुई वो दिन था 8 दिसम्बर 2006, सुबह-सुबह मेरे बिस्तर के बाजू में रखा मेरा मोबाईल बजा, पिताजी का कॉल था, कह रहे थे कि "भैया" का कॉल आया था, इस नम्बर से (उन्होंने मुझे नम्बर दिया।) भैया कह रहा था कि काम कुछ अच्छा सा नहीं लग पाया है, फिर भी कोशिश में हूँ कि अच्छा काम लग जाए। जबलपुर आने का फिलहाल कोई …

ये शायद मैं हूँ...

तेरे सवालों पर मेरी चुप्पी, तुमसे बहुत कुछ कहती है,
पर आज तक क्या कोई खामोशी को लफ्जों में समझ पाया है?

तेरे गुस्से पर मेरी आंखों की नमी, सावन का बादल बनकर बरसती है,
पर आज तक कौन सा बादल, धरती की तपिश को बुझा पाया है?

तेरे तकरार पर मेरे दिल की बेचैनी, ज्वर-भाटा सी घटती-बढती है,
पर आज तक कौन है जो, इससे उबर पाया है?

तेरे नफरत करने के अंदाज़ पर, एक शेर जुबां पर आया है,
पर ये शायद मैं हूँ, जो चुप रहकर ही इसे बयां कर पाया है।

दूसरी दुनिया बनाने की तैयारी

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आप हमेशा खुश नहीं रह सकते, रहना भी चाहें तो वो आपको रहने नहीं देगी। वही जिसे हम सब जिंदगी कहते हैं। सुबह आपके चहरे पर मुस्कराहट हो और दोपहर होते ही वो आंसुओं में बदल जाए, ऐसा होता है। बारिश के मौसम को गौर से देखिये, कब धूप निकल आएगी, कब बादल घिर आयेंगे और बरसने लग जायेंगे; सही-सही तो मौसम भविष्यवक्ता भी नहीं बता पाएंगे। खैर, अभी जब मैं ये लिख रहा हूँ तो आसमान में बड़ी तीखी वाली धूप खिली हुई है, बारिश वाली धूप जो बहुत चुभती है एकदम यादों की तरह। ऐसी यादें जो हैं तो बहुत प्यारी, जिन्हें आप याद करके सबके साथ खुश भी हो सकते हैं और अकेले में रो भी सकते हैं। बादल भी रोते हैं पर उनके रोने को हम बारिश कहते हैं, किसकी याद में रोते हैं ये तो नहीं मालूम पर इतना मालूम है कि शायद धूप भी उन्हें मीठी यादों की तरह चुभती होगी तब आंसू निकल आते होंगे। आज जब स्टूडियो की खिड़की से देख रहा था तो थोड़ा उदास था क्योंकि एक साथ बहुत सारे लोगों कि कमी अचानक से महसूस कराने में जिंदगी जुटी हुई थी। पहले बूंदा-बंदी और फिर ज़ोरदार बारिश भी शुरू हो गई थी, स्टूडियो के बाहर बादल बरस रहे थे और अन्दर मेरी आँखें। बादलों का…

" अबे ! सुनो हम जा रहे हैं, तुम अपना ख्याल रखना। bye "

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कल रात हवाएं बहुत तेज़ चल रही थी, बैचेन थीं शायद। हवाओं की बैचेनी से झलक रहा था, जैसे किसी बात को कहने की बहुत जल्दी हो। मौसम भी अचानक ही बदल गया था, मैं नर्मदा तट से लौट रहा था, तभी जेब में रखा मोबाइल बजा। मेरे मित्र अंसारी जी का कॉल था,कहने लगे कि गाड़ी किनारे लगाओ पहले, मैंने वैसा ही किया। उसके बाद जो उन्होंने कहा उस पर मैं कोई प्रतिक्रिया नही दे पाया। क्योंकि उसे वक्त मेरी एक मित्र गाड़ी पर मेरे पीछे बैठी हुई थी। उसके जन्मदिन पर बस दीपदान करके ही लौट रहे थे। थोड़ी दूरी पर मेरा एक और मित्र मिल गया और अगले एक घंटे में मेरी मित्र का जन्मदिन मनाया जा चुका था और उस एक घंटे में मेरे पास ऐसा कितने ही फ़ोन काल्स आ चुके थे, जिन पर मैं कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दे पा रहा था। पहली बार बहुत अक्षम सा महसूस हो रहा था। कुछ देर बाद अपने दोनों मित्रों को छोड़ने बाहर आया, आसमान में देखा तो लाल बादल छाये हुए थे, जैसे ताज़ा खून अभी किसी ने आसमान में बिखेर दिया हो। हवाएं और तेज़ हो चली थीं, जैसे किसी बात को कहने के बाद बेचैनी और बढ़ जाती है ठीक वैसे ही हवाएं और बेचैन हो उठी थीं। मैं ऊपर अपने मित्र के फ्ल…

प्यास

बारिश का दिन और पानी ही पानी....
फिर भी प्यास है कि बुझती नहीं..

मेरा यकीन...

अपने यकीन को ख़ुद से सरकने मत देना,
यूँ किसी पर हुआ तो, गिर जाएगा।

किसी मतलब का नही बंद.

२३ जून जबलपुर बंद...दुकाने बंद, सड़क पर ऑटो बंद, पर अपना ऑफिस खुला का खुला । भला रेडियो भी कभी बंद होता है। उस दिन बड़ी जबरदस्त भूख भी लगी थी, खाने का टिफिन भी ऑफिस नही आया, टिफिन वाले ने बिना बताये हमारे प्राण लेने शुरू कर दिए, और तो और उसी दिन अपना पर्स भूलना था मुझे घर पर। क्रिटिकल कन्डीशन, भूख है की बढती जा रही थी। सोचा साथ वालों से कुछ पैसे लेकर कुछ मंगवा लूँ, हालांकि जबलपुर बंद था पर हमारे बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर की बेकरी का आधा शटर खुला हुआ था। इससे पहले वो बंद हो जाता, मैंने अपने साथ अपने दोस्तों के लिए पेटिज़ मंगवा ली। पेटिज़ आने के बाद भूख का मामला निपटा, महज़ दो पेटिज़ खाकर अपने शाम के तीन शो किए। मेरा दोस्त ऑफिस आया घर की चाबी लेने, रात के लगभग ९:३० बज रहे थे, तब तक टिफिन नही आया था, यानि टिफिन वाले ने भी अघोषित अवकाश ले लिए था। खैर हम तो ऐसी ही स्थितियों में सर्वाइव करने के लिए पैदा हुए हैं, इसलिए फिक्र का नामो निशाँ नही था। जो मेरा मित्र मुझसे मिलने आया था उसने जाकर खाना पैक करवा लिया और ऑफिस ला दिया, जिससे मैं और मेरा एक सहकर्मी भूख की वजह से कल के अखबार की हेड लाइ…