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किसी मतलब का नही बंद.

२३ जून जबलपुर बंद...दुकाने बंद, सड़क पर ऑटो बंद, पर अपना ऑफिस खुला का खुला । भला रेडियो भी कभी बंद होता है। उस दिन बड़ी जबरदस्त भूख भी लगी थी, खाने का टिफिन भी ऑफिस नही आया, टिफिन वाले ने बिना बताये हमारे प्राण लेने शुरू कर दिए, और तो और उसी दिन अपना पर्स भूलना था मुझे घर पर। क्रिटिकल कन्डीशन, भूख है की बढती जा रही थी। सोचा साथ वालों से कुछ पैसे लेकर कुछ मंगवा लूँ, हालांकि जबलपुर बंद था पर हमारे बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर की बेकरी का आधा शटर खुला हुआ था। इससे पहले वो बंद हो जाता, मैंने अपने साथ अपने दोस्तों के लिए पेटिज़ मंगवा ली। पेटिज़ आने के बाद भूख का मामला निपटा, महज़ दो पेटिज़ खाकर अपने शाम के तीन शो किए। मेरा दोस्त ऑफिस आया घर की चाबी लेने, रात के लगभग ९:३० बज रहे थे, तब तक टिफिन नही आया था, यानि टिफिन वाले ने भी अघोषित अवकाश ले लिए था। खैर हम तो ऐसी ही स्थितियों में सर्वाइव करने के लिए पैदा हुए हैं, इसलिए फिक्र का नामो निशाँ नही था। जो मेरा मित्र मुझसे मिलने आया था उसने जाकर खाना पैक करवा लिया और ऑफिस ला दिया, जिससे मैं और मेरा एक सहकर्मी भूख की वजह से कल के अखबार की हेड लाइ…