मंगलवार, 28 जुलाई 2009

सच में तू बड़ा हो गया है...पहली किश्त

मैं ऑफिस जा रहा हूँ कुछ लाना है क्या? मैंने माँ से पूछा।माँ ने कहा " हाँ, नानी की दवाई और नाना-नानी के लिए टोस्ट और बिस्कुट, चाय के साथ लेने के लिए। गाँव भेजना है। मैंने हाँ में सर हिला दिया। माँ ने पूछा "पैसे दूँ?" मैंने कहा "हैं मेरे पास।" माँ मुस्कुरा दीं और बोली "बड़ा हो गया है तू" मैं कुछ नहीं बोला, मैं भी मुस्कुराया और बाइक उठाकर चल दिया। माँ के कहे हुए लफ्ज़ कान की दीवारों से टकराकर दिमाग के उसे कोने से जाकर टकरा गए, जहाँ कुछ यादें एक-दूसरे की गोद में सिमटी हुई थीं। उसी में से एक याद उठ खड़ी हुई और उसने आंखों की तरफ़ तेज़ी से दौड़ना शुरू किया, मैंने बाइक की रफ़्तार कम कर ली। अब तक वो याद मेरी आंखों में रफ़्तार पकड़ चुकी थी, और जहाँ से वो शुरू हुई वो दिन था 8 दिसम्बर 2006, सुबह-सुबह मेरे बिस्तर के बाजू में रखा मेरा मोबाईल बजा, पिताजी का कॉल था, कह रहे थे कि "भैया" का कॉल आया था, इस नम्बर से (उन्होंने मुझे नम्बर दिया।) भैया कह रहा था कि काम कुछ अच्छा सा नहीं लग पाया है, फिर भी कोशिश में हूँ कि अच्छा काम लग जाए। जबलपुर आने का फिलहाल कोई मन नहीं है। तुम इस नम्बर का पता करो, कहाँ का है? उसको लेकर आओ, तुम्हारे ताऊ जी कह रहे थे कि वो भी हाथ बटायेंगे सब ठीक करने में। पापा के पास भैया का ये पहला कॉल था उनके जबलपुर से जाने के बाद. मैं बिना देर किए बिस्तर से उठा, माँ को पूरी बात बताई। पापा का बताया हुआ नम्बर पता किया तो वो नागपुर का निकला, आज मैं सतना जाने वाला थे एक NGO के साथ ठेकेदारी का काम सँभालने, उसी के ज़रिये मैं अपने भाई की मदद करना चाहता था। आज जाने के लिए आठ बैग और सूटकेस के साथ पूरी तैयारी थी मेरी। माँ ने एक बैग में दो जोड़ी कपडों के साथ एक चादर रख दिया मेरे ओढ़ने के लिए। मैंने भैया के कुछ पोस्टकार्ड साइज़ फोटो रख लिए। मेन रोड पर खड़े होकर बस का इंतज़ार करने लगा, थोड़ी देर में नागपुर जाने वाली बस आ गई, मैं उस पर सवार हो गया। मैं निकल पड़ा था उस सफर में जहाँ मुझे अपने बड़े भाई तक पहुंचना था, मेरा सगा भाई जो मेरे लिए मेरा दोस्त, मेरा हमराज़, मेरा भाई सब कुछ... वो लगभग आठ महीने से लापता था, आखिरी बार मुझे मेरे दैनिक जागरण वाले ऑफिस में मिला था। उस दिन वो काफ़ी परेशान था, जब वो ऑफिस आया तो बोला, "अपनी घड़ी दे, मेरे जूते तू पहन ले और अपने जूते दे, साथ में ये मोबाईल रख बैट्री ख़त्म हो गई है इसकी। मुझे शहर का मैप बनाना है, प्रोजेक्ट के लिए। " मैंने उससे कहा, कि लूना ले जाए साथ में।" तो कहने लगा कि काम में मुश्किल होगी। मैंने कहा ठीक है, वो चला गया। रात को मैं घर पहुँचा, तब तक वो नहीं आया था। देर रात तक नहीं आया, सुबह भी नहीं आया, उसका कोई कॉल भी नहीं आया। रात से मैं और मेरी माँ परेशां थे, पिताजी उस वक्त शहर के बाहर पोस्टिंग पर थे हलाँकि उन्हें भी बता दिया था इस बारे में। दोपहर में पुलिस थाना जाकर भैया के गुम होने की रिपोर्ट दर्ज करायी। उसके बाद से आज तक बस उनके आने का इंतज़ार ही कर रहे थे। मेरे भाईसाहब की किस्मत बहुत अच्छी नहीं थी, क्योंकि उन्होंने जितने भी काम किए उनमे खूब मेहनत की पर फायेदे के अलावा सब कुछ हुआ। मशरूम प्रोडक्शन, अगरबत्ती प्रोडक्शन, साइबर कैफे किसी में भी फायदा नहीं हो पाया। उल्टा क़र्ज़ में डूबते गए और क़र्ज़ लौटाया भी दस टके के ब्याज पर, अब तक वो दूसरो का पैसा दुगना कर चुके थे। फिर भी सूदखोर उनका पीछा नहीं छोड़ रहे थे, बात अब घर तक आने लगी थी। भैया काफ़ी हताश हो चुके थे। शायद इसलिए घर छोड़ दिया, हम लोगों को परेशानी न हो इसलिए आज तक घर से कोई कांटेक्ट भी नहीं किया। दोपहर से चला शाम को नागपुर पहुँचा, वहां पहुंचकर उसी नंबर पर फ़ोन किया, उसने बताया कि ये गणेश पेठ एरिया का नम्बर है। मैं भैया की फोटो लेकर उस जगह पहुँचा और लोगों को दिखाकर पूछने लगा उनके बारे में। एक दुकान में, एक बन्दा शेविंग करवा रहा था, फोटो देखकर बोला कि "ये भैया तो रोज़ मेरी दूकान के सामने सुबह नौ बजे निकलते है, बहुत अच्छे कपड़े पहनते हैं। हाथ में एक बड़ी घड़ी भी पहनते हैं। लाल रंग के बाल हैं। पर कभी किसी से बात करते हुए नहीं देखा। आप कल आ जाओ मेरी दुकान पर, वहां मिल लेना इनसे।" मैं कल होने का इंतज़ार करते हुए वहां पास के एक लोंज में जाकर रुक गया। बस यही सोच रहा था कि सवेरा कितनी जल्दी हो जाए।

शनिवार, 25 जुलाई 2009

ये शायद मैं हूँ...

तेरे सवालों पर मेरी चुप्पी, तुमसे बहुत कुछ कहती है,
पर आज तक क्या कोई खामोशी को लफ्जों में समझ पाया है?

तेरे गुस्से पर मेरी आंखों की नमी, सावन का बादल बनकर बरसती है,
पर आज तक कौन सा बादल, धरती की तपिश को बुझा पाया है?

तेरे तकरार पर मेरे दिल की बेचैनी, ज्वर-भाटा सी घटती-बढती है,
पर आज तक कौन है जो, इससे उबर पाया है?

तेरे नफरत करने के अंदाज़ पर, एक शेर जुबां पर आया है,
पर ये शायद मैं हूँ, जो चुप रहकर ही इसे बयां कर पाया है।

मंगलवार, 21 जुलाई 2009

दूसरी दुनिया बनाने की तैयारी



आप हमेशा खुश नहीं रह सकते, रहना भी चाहें तो वो आपको रहने नहीं देगी। वही जिसे हम सब जिंदगी कहते हैं। सुबह आपके चहरे पर मुस्कराहट हो और दोपहर होते ही वो आंसुओं में बदल जाए, ऐसा होता है। बारिश के मौसम को गौर से देखिये, कब धूप निकल आएगी, कब बादल घिर आयेंगे और बरसने लग जायेंगे; सही-सही तो मौसम भविष्यवक्ता भी नहीं बता पाएंगे। खैर, अभी जब मैं ये लिख रहा हूँ तो आसमान में बड़ी तीखी वाली धूप खिली हुई है, बारिश वाली धूप जो बहुत चुभती है एकदम यादों की तरह। ऐसी यादें जो हैं तो बहुत प्यारी, जिन्हें आप याद करके सबके साथ खुश भी हो सकते हैं और अकेले में रो भी सकते हैं। बादल भी रोते हैं पर उनके रोने को हम बारिश कहते हैं, किसकी याद में रोते हैं ये तो नहीं मालूम पर इतना मालूम है कि शायद धूप भी उन्हें मीठी यादों की तरह चुभती होगी तब आंसू निकल आते होंगे। आज जब स्टूडियो की खिड़की से देख रहा था तो थोड़ा उदास था क्योंकि एक साथ बहुत सारे लोगों कि कमी अचानक से महसूस कराने में जिंदगी जुटी हुई थी। पहले बूंदा-बंदी और फिर ज़ोरदार बारिश भी शुरू हो गई थी, स्टूडियो के बाहर बादल बरस रहे थे और अन्दर मेरी आँखें। बादलों का तो नहीं पता पर मुझे अपना दोस्त याद रहा था, "विकास"। थोड़ी देर के लिए ही सही, मैं स्वार्थी हो गया था। यही सोच रहा था कि वही क्यों, मैं क्यों नहीं। कुछ साल पहले मेरा बड़ा भाई और अब कुछ दिन पहले मेरा दोस्त। दोनों एक ही जगह चले गए, दोनों का स्नेह तो मेरे लिए था पर टेलेंट दुनिया के लिए और मुझे ये भी लगता है कि दोनों जिस जगह पर हैं, वहां से मेरी जिंदगी बनाने में कोई कसर नहीं छोडेंगे। जिस ऊपर वाले ने उन्हें बुलाया है उसकी नाक में ज़रूर दम करेंगे और थक-हारकर दुनिया को चलाने वाला भी उनके इशारों पर चलेगा। जो लोग उन दोनों को जानते हैं वो मेरी बात से ज़रूर सहमत होंगे। कभी-कभी ऐसा लगता है कि दुनिया चलाने वाला इस दुनिया के हाल और हालत से बड़ा खुश है तभी तो ऐसे दो लोगों को अपने पास बुला लिया जो उसकी सल्तनत के लिए खतरा थे। दोनों के गजब का जोश पूरी दुनिया पर भारी पड़ने वाला था। इस दुनिया की सल्तनत का मालिक बड़ा डरपोक है और स्वार्थी भी। मेरा ख्याल तो आया ही नहीं, तन्हा कर दिया। अब ऐसा कोई नहीं है जो मेरे साथ स्याह रात में वक्त बे वक्त निजी जिंदगी से लेकर दुनियादारी की बातों पर चाय की भाप और सिगरेट का धुँआ उड़ा सके। किससे उम्मीद करूँ, इस दुनिया का मालिक तो अपनी ही बनाई बेशकेमती चीज़ों का कलेक्शन करने में लगा हुआ है। शायद इस दुनिया को मिटाने के पहले अपनी कुछ नायाब चीज़ों को समेटकर दूसरी दुनिया बनने की तैयारी में लगा है वो। पर इतनी भी क्या जल्दी है इस दुनिया को मिटाने की, कि हम लोगों के आंसू देखने की भी फुर्सत नहीं है उसे?

रविवार, 19 जुलाई 2009

" अबे ! सुनो हम जा रहे हैं, तुम अपना ख्याल रखना। bye "


कल रात हवाएं बहुत तेज़ चल रही थी, बैचेन थीं शायद। हवाओं की बैचेनी से झलक रहा था, जैसे किसी बात को कहने की बहुत जल्दी हो। मौसम भी अचानक ही बदल गया था, मैं नर्मदा तट से लौट रहा था, तभी जेब में रखा मोबाइल बजा। मेरे मित्र अंसारी जी का कॉल था,कहने लगे कि गाड़ी किनारे लगाओ पहले, मैंने वैसा ही किया। उसके बाद जो उन्होंने कहा उस पर मैं कोई प्रतिक्रिया नही दे पाया। क्योंकि उसे वक्त मेरी एक मित्र गाड़ी पर मेरे पीछे बैठी हुई थी। उसके जन्मदिन पर बस दीपदान करके ही लौट रहे थे। थोड़ी दूरी पर मेरा एक और मित्र मिल गया और अगले एक घंटे में मेरी मित्र का जन्मदिन मनाया जा चुका था और उस एक घंटे में मेरे पास ऐसा कितने ही फ़ोन काल्स आ चुके थे, जिन पर मैं कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दे पा रहा था। पहली बार बहुत अक्षम सा महसूस हो रहा था। कुछ देर बाद अपने दोनों मित्रों को छोड़ने बाहर आया, आसमान में देखा तो लाल बादल छाये हुए थे, जैसे ताज़ा खून अभी किसी ने आसमान में बिखेर दिया हो। हवाएं और तेज़ हो चली थीं, जैसे किसी बात को कहने के बाद बेचैनी और बढ़ जाती है ठीक वैसे ही हवाएं और बेचैन हो उठी थीं। मैं ऊपर अपने मित्र के फ्लैट में पहुँचा, थक के बैठक के बिछौने में ही बिखर गया। हवाएं बहुत तेज़ हो चुकी थीं, ऐसा लग रहा था, जैसे खिड़की-दरवाज़े तोड़कर घर में दाखिल होना चाहती हो। अब भी किसी बात की बैचेनी हवाओं की सरसराहट में महसूस कर सकता था मैं। कुछ देर बाद मेरी मित्र ने मेरे चहरे पर आते-जाते हुए भावों को देखकर जानना चाहा की मुझे क्या हुआ है? मैं तो सही सलामत था, लेकिन मेरा अभिन्न मित्र, विकास परिहार अब इस दुनिया में नहीं है। भोपाल में थोड़ी देर पहले शाम को उसकी एक सड़क हादसे में मौत हो गई। ये वही व्यक्ति है जो अपनी स्पष्टवादिता, साहित्यिक ज्ञान, मेहनत, लगन, लिखने की अद्भुत कला, अपनी अद्वितीय हिन्दी ब्लॉग्स, बड़े भाई के लिए किए गए अपने सपनों के त्याग(जिसे सिर्फ़ मैं जानता हूँ), तीखी प्रतिक्रियाओं और न जाने कितनी ही विस्मयकारी प्रतिभाओं के लिए जाना जाता था। अपने परिवार, मित्र गण और जानने वालों के साथ-साथ साहित्य जगत को भी अपनी कमी से भर जाने वाला मेरा मित्र, अब सिर्फ़ इन्टरनेट के ब्लॉग्स, पत्रकारिता की उत्तरपुस्तिकाओं, रेडियो पर आने वाले अपने शो की पुरानी रिकॉर्डिंग (93.5 sfm jabalpur में DD यानि धर्मध्वज संकटमोचन नारायण प्रसाद सिंह पाण्डेय धरमवीर कुमार चक्रवर्ती शर्मा उर्फ़ DDSM NPSM DKCS नाम से पूरा पर आधा अधुरा कहने वाला रेडियो जौकी, तफरीह जंक्शन में मेरे साथ कभी शो किया करता था। ) , लोक सेवा आयोग की मुख्य परीक्षा में शामिल होने वाले प्रतियोगियों की लिस्ट और सोशल नेट्वर्किंग साइट्स की प्रोफाइल्स में रह गया था। हम दोनों एक-दूसरे को पिछले चार साल से जानते थे, रेडियो में आने से पहले दोनों के बीच की understanding तो अच्छी थी लेकिन chemistry बिल्कुल नहीं थी, जिसकी दरकार रेडियो में थी। बहुत जल्द chemistry भी बन गई। रेडियो के श्रोता हम दोनों की शो में होने वाली नोक-झोंक को बहुत पसंद करते थे। मेरा दोस्त कहता था कि उसका राजयोग लिखा है, हम दोनों एक साथ ही नौकरी करते एक साथ ही छोड़ते। ज्यादातर लोग हम दोनों को नौकरी छोड़ने के लिए जाने जाते थे। उसके कहने पर ही रेडियो पर मैं आया, आज उसका अहसानमंद हूँ कि उसकी वजह से शहर के लाखों लोग मुझे जानने लगे हैं। पर जब भी मैं उसे यही अहसान वाली बात कहता तो चिड कर कहता, तुम अपनी प्रतिभा की वजह से यहाँ हो। खैर, प्रतिभा की बात ठीक है लेकिन अगर उसने मुझे इंटरव्यू की सूचना नहीं दी होती तो मैं अभी किसी अखबार की नौकरी बजा रहा होता। रेडियो की जॉब भी उसने शायद ही पूरे एक साल की होगी, नौकरी छोड़ कर वो लोक सेवा आयोग की परीक्षा की तैयारी करने लगा था, पहली परीक्षा तो उसने बिना कोचिंग के निकाल चुका था, मुख्य परीक्षा के लिए कोचिंग करने भोपाल में कुछ दिनों से था। नर्मदा से लौटते हुए अपनी मित्र से बस उसकी ही बात कर रहा था, कि मेरे पास अंसारी जी का फ़ोन कॉल आ गया....... कल रात जब कोई आहट होती तो ऐसा लगता कि "विकास" आकर कहने वाला हो - " अबे ! सुनो हम जा रहे हैं, तुम अपना ख्याल रखना। bye "





विकास उर्फ़ Rj DD तफरीह जंक्शन शो में






विकास उर्फ़ Rj DD तफरीह जंक्शन शो के दौरान मेरी चोटी (शिखा) को खीचते हुए। मस्त टाइम था वो।


विकास परिहार के कुछ ब्लॉग्स
http://ishamammain.blogspot.com/
http://swasamvad.blogspot.com/

विकास परिहार के सोशल नेट्वर्किंग प्रोफइल्स
www.orkut.co.in/Main#Profile.aspx?origin=is&uid=10674325345367446864

www.orkut.co.in/Main#Profile.aspx?uid=11084617886346061862

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विकास परिहार की एक रचना :
Tuesday, October 23, 2007

ऐ मौत मुझे ले चल

दिल में उथल-पुथल है,
मन में मची है हलचल।
ऐ मौत मुझे ले, ऐ मौत मुझे ले चल।

स्वस्म्वाद से...



विकास परिहार दाहिने से दूसरा (खड़े हुए)


श्रद्धांजलि .......

गुरुवार, 16 जुलाई 2009

प्यास

बारिश का दिन और पानी ही पानी....
फिर भी प्यास है कि बुझती नहीं..

मंगलवार, 14 जुलाई 2009

मेरा यकीन...

अपने यकीन को ख़ुद से सरकने मत देना,
यूँ किसी पर हुआ तो, गिर जाएगा।