गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

सर्दी

आज मेरा शहर चलते-चलते,
थोड़ा लड़खड़ा गया,
नटखट ठण्ड ने,
टंगड़ी जो अड़ा दी थी...

सोमवार, 29 नवंबर 2010

बात

चुप हूँ क्यों ये सवाल हुआ है, जो बोल पड़ा तो बड़ा बवाल हुआ है...

रविवार, 28 नवंबर 2010

Chatting

जब कभी, कहीं मिलती हो,
कहती हो कि मेरी सुनो-अपनी भी कहो,
कहने-सुनने के लिये दो लोगों की ज़रूरत पड़ती है,
तुम्ही कहो, क्या तुम मुझसे अलग हो???

शनिवार, 27 नवंबर 2010

डर

पूरे दिन बीते मंज़र की कतरन,
जेब से निकालकर रख देता हूँ,
घर की मेज़ पर,
दूसरे दिन फिर बटोरकर,
उन्हें जोड़कर,
आगे की कड़ी ढूंढ़ता हूँ,
कई बार,
मेरे सोते से,
बहुत सारी  कतरन,
रात की हवा उड़ा ले गयी,
तभी से देर रात तक,
जागने की आदत पड़ गयी है...

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

तन्हा

मोहब्बत वाले दिन भी अजीब होते हैं,
जब याद आते हैं तो,
बिछड़ने की याद ताज़ा कर जाते हैं,
मैं भी कुछ दिनों पहले तन्हा हुआ हूँ...

सोमवार, 22 नवंबर 2010

चाँद की कोशिश

आसमां ने चहरे पर पोत रखी है कालिख, 
और चाँद कोशिश में है उसे साफ़ करने,
सुबह ये कोशिश रंग लायेगी,
जब सूरज फ़लक पर खिल आएगा...

मंगलवार, 16 नवंबर 2010

दो पैर वाले का डर

ओए ! उस दो पैर वाले के पास मत जा,
वो आदमी है!
पहले पुचकारेगा, फिर
लात मारके भगा देगा...

सच, झूठ और शराब

लोग शराब का नाम खराब करते हैं,
न पीने के पहले सच बोलते हैं, न पीने के बाद,
हम भी शराबी हैं, पीने के बाद हमने भी कभी सच नहीं बोला,
इस जाम की कसम...

मंगलवार, 19 अक्तूबर 2010

थ्योरी क्लास

काश कि मोहब्बत की थ्योरी क्लास लगतीं,
कम से कम ये तो पता चल जाता,
कि "पास" होने  की तैयारी कैसे करनी है.
आये दिन इम्तिहान जो देने पड़ते हैं....

रविवार, 17 अक्तूबर 2010

कागज़

एक कोरा कागज़,
रात भर कोरा रह गया,
इस फिक्र में,
कि कुछ तो इसमें लिखा जाएगा.

शुक्रवार, 15 अक्तूबर 2010

हम

चौपाटी के बहुत पास, एक हरा-भरा बगीचा है,
जहाँ हमने एक साथ कुछ वक्त गुज़ारा था,
उस शाम किसी बात पर नोक-झोंक भी हुई थी,
अक्सर किसी न किसी बात पर,
हम अड़ जाते थे बात करते-करते,
और बात भी बहस में बदल जाया करती थी,
इस बहस में हमारा रिश्ता भी,
बिखर जाया करता था वैसे ही,
जैसे कांच गिरकर बिखरता है फर्श पर,
कई बार बिखरा है,
लेकिन बिखरने के लिए साबुत भी होना पड़ता है,
अब तक सोचता हूँ,
कि इतनी बार बिखरकर सब कुछ साबुत कैसे है?

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

अयोध्या का फैसला...

आज सोसाइटी के बच्चे, सुबह से खेल रहे हैं...
उन्हें लगता है कि ये छुट्टी का माहौल रोज क्यों नहीं रहता,
और बस्ती के बच्चों में खौफ है,
अगर दो-चार दिन ऐसा ही रहा,
तो दो वक्त की रोटी का इंतजाम कैसे होगा???
धर्म का नहीं...गरीबों की भूख का आज फैसला होगा,
यही कोई दोपहर में तीन-साढ़े तीन बजे.


(पुणे, महाराष्ट्र में अपने दोस्त के घर से)

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

Surya's Dil kee baat

सभी पाठकजनों को सूचित किया जाता है कि अब हम RJ (रेडिओ जौकी) नहीं हैं, कहने का मतलब है कि रेडियो पर बोलने का काम छोड़ दिया है. इसलिए ब्लॉग का शीर्षक भी बदल दिया है. अतः जो शीर्षक आपको दिखाई दे रहा है वो एकदम सत्य है, आपका दृष्टि भरम नहीं. व्यर्थ में किसी आँखों के चिकित्सक के पास जाकर उसकी कमाई में योगदान न दें.
धन्यवाद
चक्रेश सूर्या
फिलहाल अभी स्वतन्त्र लेखक, स्क्रिप्ट राइटर, कॉपी राइटर, क्रीएटिव राइटर और कॉन्सेप्ट विसुअलाइज़र हैं.

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

थकान

कॉफी हाउस की कुर्सियाँ,
दिन भर खड़े-खड़े थक जाती हैं,
तभी तो,
देर रात को,
टेबल पर,
पलटकर बैठ जाती हैं....

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

डायलॉग

जब ज़िन्दगी चंद इत्तेफाकों की मोहताज हो जाये तो फिर ज़िन्दगी खुदके अंदाज़ में जीना बेहतर है...(ऐसे ही ख्याल आया...जब कोई फिल्म बनाऊंगा तो उसमें ये डायलॉग ज़रूर रखूँगा.)

बुधवार, 30 जून 2010

तुम होते तो 27 के होते

माँ कहती है, आज अगर तुम होते तो 27 के होते,
और तुम्हारे जन्मदिन पर, आज शाम को खूब मस्ती करते.
पर! आज सुबह मैंने दीवार से तुम्हारी तस्वीर उतर कर,
उस पर फूलों की माला चढ़ाई, और माँ ने तिलक लगाया,
आज घर में खीर और सब्जी-पुड़ी बनी है,
माँ जानती है, तुम्हें क्या पसंद है...
Happy B'day Bhai...God bless u!

सोमवार, 21 जून 2010

कुछ दिनों की मेहनत

इश्क बरसे गोलमाल...(इश्क बरसे राजनीति से और गोलमाल का title ट्रैक.

मंगलवार, 25 मई 2010

पिछले दिनों इनमें व्यस्त था....

मेरा पहला रीमिक्स, रावण फिल्म से....





और कुछ ये भी....
इसे पैरौडी कह सकते हैं....
ये हमारे शहर के traffic signals के हालात.. 



ये भी बनाया था...
इसमें रानीताल Stadium   की दुर्दशा की बारे में बताया गया है...

शनिवार, 20 मार्च 2010

मछलियाँ

पिछले दो हफ्ते से,
aquarium का पानी,
मटमैला हो गया,
उसके पास,
पानी बदलने का,
वक़्त भी नहीं था,

क्योंकि,
ज़्यादातर,
वो मेरे साथ रहती थी,
अब तो,
मछलियों को भी,
मुझसे इर्ष्या होती है,
तभी तो,
मेरे हाथ से,
खाने का दाना तक,
नहीं खातीं..

सोमवार, 15 मार्च 2010

प्रेरणा

सर्द रातों में,
जब तुम,
शॉवर के नीचे खड़ी होती हो,
तो पानी की बर्फ सी बूंदे, 
पड़ती हैं तुम पर,
और फिर चिपक जाती हैं,
दीवारों से,
तुम्हारे दीदार के लिये,
पर तब तक तुम,
तौलिया लपेट कर,
बाहर आ जाती हो,
जहाँ मैं लैपटॉप लिये,
बैठा होता हूँ,
बर्फ बनकर...

 

गुमनाम रिश्ता

जिंदगी में बहुत रिश्ते देखे हैं,
बेटे का माँ-बाप से,
भाई का भाई-बहिन से,
दोस्ती का दोस्तों से,
प्रेमी का प्रेमिका से,
इन रिश्तों में,
जब कभी झगड़ा होता है,
तो रिश्तों के दरमियाँ,
लकीर खिंच जाती है,
लेकिन एक रिश्ता ऐसा भी,
देख रहा हूँ,
जहाँ,
तमाम झगड़ों के बावजूद,
न तो मैं लकीर खीच पाया,
न ही वो,
और ताज्जुब की बात ये है,
कि इस रिश्ते का कोई नाम नहीं...

गुरुवार, 11 मार्च 2010

Comment

मुस्कुराएंगे, शर्मायेंगे, घबराएंगे, धडकनों का इम्तिहां होगा...
उनसे जब सामना होगा, पता नहीं क्या-क्या होगा?

(मेरा एक मित्र अपनी प्रेयसी से मिलने वाला थे पहली बार, उसके FB status को देखकर यही सूझा.)

रेस्त्रौं का बिल

तुम्हें पता है कि मैं रेस्त्रौं की पर्चियां क्यों संभाल कर रखता हूँ,
ताकि मुझे वो तारीख याद रहें, जब हम-तुम साथ थे,
ये तो साइंस ने भी पता लगा लिया है कि,
"हम" तारीख याद रखने के मामले में कमज़ोर हैं,
और वैसे भी भूलना तो इंसानी फ़ितरत है,
लेकिन भूले-भटके इंसान की भी ज़रूरत इश्क है,
पर मैं तुम्हें नहीं भूला हूँ,
और ऐसी ही किसी पर्ची पर आकर ठहर गया हूँ...

पता

जिनके पते पर हम मिला करते थे कभी,
अब वो खुदसे लापता हो गए हैं,
और कुछ इस तरह भी गुम हुए वो लोगों से,
कि अब उनके ख़त हमारे पते पर आते हैं...

calling myself....

पूरा दिन निकल जाता है,
दूसरों से मिलने में,
पर कभी खुद से मिलने का,
वक़्त नहीं मिलता,
और जब मिलने की कोशिश करो,
तो वक़्त पूरा नहीं पड़ता,
कल रात खुद से मिलने की जद्दोजेहद में,
पता ही नहीं चला कि रात कब सो गयी,
पर मैं जागता रहा,
खुद से गुफ़्तगू करता रहा,

यहाँ-वहां के किस्से,
और बातें खुद से करता रहा,
यकीन मानो,
किसी और से मुलाकात इतनी मजेदार नहीं थी,
जितनी कि खुदसे...
अक्सर लोगों को कहते सुना था,
कि जब भी खुद का मोबाइल नंबर डायल करो,
तो नंबर बिज़ी ही मिलेगा,
लेकिन कभी खुद के दूसरे नंबर से,
कॉल करके देखना,
बाकायदा रिंग आएगी...
इसे कहते हैं, calling myself....

मंगलवार, 9 मार्च 2010

कोशिश

नफ़रत करने के कई बहाने तुम्हें दे दिए,
अब तो मुझे अपनी गिरफ्त से आज़ाद कर,
तुझे भूलने में मैं तो न जीत पाया,
तू अपनी नफ़रत को कामयाब कर...

फ़ितरत

जिनपे गुजरी है उनसे पूछे कोई हकीक़त क्या है?
वो मुस्कुरा के कहेंगे, जाने दो..अब उनसे वास्ता क्या है?

मेहनत

कभी सोचा है
किसी रिश्ते को गढ़ने में,
जितना वक़्त लगता है,
उससे कहीं कम,
उसे उधेड़ने में,
लेकिन जो मेहनत,
उधेड़ने में लग रही है,
वही उसे संवारने में होती,
तो,
तो न चेहरे पे शिकन होती,
न दिल में हरारत,
और न ही फ़िज़ूल के ख्याल.

सोमवार, 8 मार्च 2010

ख्वाहिश

आज सोचा उसे बेवफ़ा का तख़ल्लुस दिया जाये,
चलके किसी तवायफ़ से दिल लगाया जाये,
पर्दा-ए-हुस्न का हुनर तो देख लिया,
अब ज़रा बेपर्दा-ए-हुस्न का तमाशा भी देखा जाये,
यूँ तो सब हकीक़त छुपा के रखते हैं,
पर जिसके पास छुपाने को न हो कुछ,
ज़रा उसकी महफ़िल में भी ठहरा जाये,
चलके किसी तवायफ़ से दिल लगाया जाये...

मुक़म्मल

तुम ख़ुद एक ग़ज़ल हो,
तुम्हें किसी मिसरे की ज़रूरत नहीं,
तुम अपने आप में मुक़म्मल हो,
तुम्हें किसी शे'र की ज़रूरत नहीं...

लहजा

कल रात माँ से ऊँची आवाज़ में बोल पड़ा,
और वो धीमे लहजे में बात करती रहीं,
जब से होश संभाला है,
उसके बाद पहली बार ऐसा हुआ,
काफी बुरा लगा मुझे,
अब सोच रहा हूँ कि,
होश न संभालता तो ही अच्छा था...
sorry माँ,
पर मेरी माँ बहुत अच्छी हैं,
वो मुझसे नाराज़ ही नहीं होतीं...

सुरूर

मय' जब हलक से उतरती है,
तो अलफ़ाज़ उसमें तैरने लगते हैं,
जो ख्याल दिन में आके जल जाते हैं,
वो रात में पन्नों पर उतर जाते हैं...

बुधवार, 3 मार्च 2010

and the award goes to....

Blog of the month for February 2010
बेचैनी के सभी पाठकों और Blog of the month foundation को बहुत-बहुत धन्यवाद.

मंगलवार, 2 मार्च 2010

मंज़र

कहते हैं आँखों देखा भी यकीन के काबिल नहीं होता, 
ये कहकर खुदको तसल्ली देना ठीक है...
पर ज़रूरत क्या है देखने की,
जब देखना ही तकलीफ देने लगे...

सोमवार, 1 मार्च 2010

मिज़ाज़

किसके ज़हन में गहरा उतर जाऊं,
ताकि कोई ढूंढ़ न सके मुझे,
बहुत दिन बीत गए,
कहीं खोये हुए...

अलगाव

गमले से बाहर पड़ा हुआ पौधा,
बड़ी उम्मीद से टकटकी लगाये,
देख रहा है उस गमले को,
जिसमें कभी वो गहराई तक जमा था,
आज सुबह उसे माली ने उखाड़ दिया,
क्योंकि न तो वो बढ़ रहा था,
और न ही फल-फूल रहा था...

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

चाँद की शरारत

चाय पीने के लिये दफ्तर से बाहर निकला तो देखा,
कि आज चाँद पूरा है फ़लक पर,
और झाँक रहा है ज़मीन की तरफ,
कुछ आगे बढ़ा तो पता चला कि,
तुम्हारी छत के बहुत नज़दीक है चाँद,
और ताक रहा है कि कब तुम ऊपर आओ,
चाँद भी बेहद शरारती हो गया है.

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

शहीदों का सम्मान

ग्वालियर में सचिन का दोहरा शतक एक वर्ल्ड रिकॉर्ड है. इसमें कोई शक नहीं कि सचिन ने एक महान पारी खेली है. सचिन के इस दोहरे शतक का जश्न भारतीय अगले दो दिन तक ज़रूर मनाएंगे. हालाँकि सचिन ने जिस दिन इतिहास रचा उस दिन भारतीय रेल मंत्री ममता बेनर्जी भी अपने रेल बजट की पारी खेल रही थीं, और उनके इस रेल बजट का असर भारतीयों पर अगले एक साल तक ज़रूर रहेगा. वैसे आज के अखबारों और न्यूज़ चैनल्स में क्रिकेट और रेल बजट जैसी दो चीज़ें प्रमुखता से दिखाई जा रही हैं लेकिन कल के ही दिन श्रीनगर में एक आतंकी हमले के दौरान शहीद हुए सेना के कैप्टेन देविंदर सिंह जास,नायक सेल्वा कुमार और पैराट्रूपर इम्तियाज़ अहमद थोकर के बारे में बहुत कम अखबारों और न्यूज़ चैनल्स ने कवरेज दिया. बहुत दुःख की बात है कि हमारे देश के असली नायकों के लिए ज़्यादातर लोगों के पास वक़्त नहीं है. अब चाहे वो मीडिया ही क्यों न हो. शायद यही कारण भी है कि भविष्य बनाने के मामले में हमारे देश की युवा पीढ़ी की रूचि राजनीति, मनोरंजन और खेल के क्षेत्र में ज्यादा है जबकि सेना में जाने के लिए उनमें उत्साह काफी कम है. मेरा उद्देश्य सचिन के खेल की अहमियत कम करना नहीं है, मैं चाहता हूँ कि लोग उनका भी सम्मान करें जिनकी वजह से भारत के करोड़ों लोग बिना किसी डर के अपने-अपने टीवी सेट्स पर सचिन की सेंचुरी और शाहरुख़ की एक्टिंग देखते हैं. उन शहीदों को शत-शत नमन.

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

अकेलापन

दिन भर के बाद जब शाम को घर जाता हूँ,
तो सबसे पहले घर के ताले से रु-बा-रु होता हूँ,
और जब दाखिल होता हूँ अन्दर,
तब घर से सामना होता है मेरा,
सुबह से मेरे जाने के बाद,
कोई होता नहीं है उससे बतियाने को,
इसलिए शाम को मुझे देखते ही,
उसका मुँह सूज जाता है,
सारी नाराज़गी मुझ पर ज़ाहिर करता है,
एक बात बताऊँ,
उस घर के दांत नहीं हैं,
फिर भी वो मुझे काटने को दौड़ता है.

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

तवायफ़

उसके यहाँ वो सब जाते हैं
जिन्हें जाने का मौका मिलता है,
जो दिन के उजाले में जाने से कतराते हैं
वो रात में गुम होकर जाते हैं,
जो खुले चेहरों में जाने से डरते हैं
वो चेहरा ढंककर जाते हैं,
जिन्हें अपनी सरहद पर दूसरे की परछाईं बर्दाश्त नहीं
वो वहां अगल-बगल बैठते हैं,
जिन्हें एक थाली में खाने से परहेज़ है
वो वहां एक पानदान से पान नौश फरमाते हैं,
जो एक बर्तन का पानी नहीं पीते
वो वहां एक ही सुराही से जाम पलटते हैं,
जो उसके दर से बाहर निकलते ही बंटकर
हिन्दू-मुसलमान, अमीर-गरीब हो जाते हैं,
उसके यहाँ सब एक हो जाते हैं,
धरम-अधरम, ऊँच-नीच, बड़ा-छोटा
उसके यहाँ ये कुछ नहीं होता,
उसके कोठे पे,
सब उसके मुरीद होते हैं....

कॉफ़ी टेबल

वो कॉफ़ी हाउस की टेबल याद है तुम्हें?
बारह नंबर वाली,
जहाँ अक्सर हम बैठा करते थे,
कॉफ़ी पीते थे कभी, नाश्ता भी करते थे,
लड़ते भी थे कई बार वहां,
और कई बार सुलह भी करते थे,
अभी कुछ दिनों पहले मैं वहां गया था,
वो टेबल मुझे देख कर बोली,
अमां! आज अकेले ही आये हो?
वो नहीं आयी???

कॉफ़ी

तुम जब जा रहीं थीं
तब कॉफ़ी रो रही थी
प्यालों से बाहर गिरकर
पहली बार ऐसा हुआ
तुम्हारे जाते वक़्त,
ये संयोग नहीं
वियोग है,
पर कुछ दिन का...

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

पता नहीं क्या है?

चेहरा क्या है?
धोखा है,
और इस धोखे पे,
पूरी दुनिया फ़िदा है.

सबने ओढ़ रखे हैं,
चेहरों पर चेहरे,
असली चेहरा न जाने,
कहाँ छुपा है?

हर चेहरे पर,
दो नज़र गड़ी हैं,
इन नज़रों में भी,
गज़ब का धोखा है.

हर नज़र धोखे में हैं,
और हर चेहरा धोखा है.

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

परी है या तवायफ़

कुछ देर के भूल जाओ खुदको,
आखिरी शब्द तक बस "मैं" हो जाओ,

कल दोपहर हुस्न की बाँहों में था,
देर तक, उलझा हुआ,
बहुत सारी ख़ामोशी बाँटी थी हमने,
एकदम वैसी जैसी किसी बवंडर के पहले होती है,
पहले कभी उसी हुस्न को मोहब्बत कहते थे,
पर जिस वफ़ा ने कईयों के तख्ता-पलट कर दिए थे,
उसी वफ़ा ने मोहब्बत को भी,
हुस्न में बदल दिया,
अब तक जो एकदम साफ़ थी नीले आसमां की तरह,
जिसे आजतक कोई बादल न ढँक पाया था,
और न ही बदल पाया था,
पर कल रात, उस हुस्न को किसी और की बाँहों में देखा,
और यही सोचता रह गया,
परी है या तवायफ़...

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

लाइफ

नया-नया प्यार होता है, तो जिंदगी की बिंदी, नुक्ता और बड़ी इ हटकर,
लाइफ बन जाती है वो,
और इस लाइफ में फूलों के वो रंग भी दिखने लगते हैं,
जो किसी बगिया में होते ही नहीं हैं,
बिस्तर के आस-पास अखबारों, कागजों, कपड़ों, कटोरी-चम्मचों का ढेर लग जाता है,
चादरों, कम्बलों पर सिलवटें पड़ जाती हैं और तकिये बालों के छोटे टुकड़ों से पट जाते हैं,
पूरी रात एक-दूसरे को सुलाते-सुलाते बीत जाती है और सुबह सोने का मन करता है,
एक साथ घूमना, खाना-पीना, चौपाटी में कॉफ़ी की चुस्कियां लेना कितना अच्छा लगता है,
ज़मीने हकीक़त से दूर, आसमां में चाँद के पास तारों को नया नाम देना...
बहुत कुछ होता है,
वैसे प्रैक्टिकल लोग भी ऐसा ही करते हैं,
मिलते वक़्त कभी अलग होने के बारे में नहीं सोचते,
पर प्रैक्टिकली यही होता है,
कि पानी नहीं सीचने से गुलाब का पौधा भी मर जाता है,
और कोई उबली हुई चायपत्ती उसे हरा-भरा नहीं कर सकती,
चाहें वो कितनी भी ब्रांडेड क्यों न हो...

घर

मेरे घर के सामने का मकान,
वैसे तो टायर का गोदाम है,
उसकी अंदरूनी दीवारें रबर की कालिख से,
रंग गयी हैं,
मकान के अन्दर बस नए टायरों की महक है,
जो उसका दम घोटती हैं,
वो मकान किसी से बात तक नहीं करता,
पर आज सुबह,
कई सालों से उदास उस मकान की आवाज़ सुनकर,
मैं घर से बाहर निकला,
वो हँस-हँस कर बातें कर रहा था,
फड़की से,
जो वहां घोंसला बनाकर, अंडे भी रख चुकी थी अपने,
उसकी ख़ुशी से मुझे अंदाजा हो गया था,
कि वो मकान, अब घर बन चुका है...

गौरैया

शहर में आज-कल कम ही देखने को मिलती है वो,
पर जाने मेरे कमरे में कहाँ से आ गयी,
आते ही बुल्शेल्फ़ के सबसे ऊपरवाले हिस्से में चढ़ गयी,
कुछ सोचते-सोचते उसने कोशिश की वहां सुकून से बैठने की,
बहुत देर तक जद्दो-जेहद में लगी रही,
लेकिन वहां की किताबें उसे जगह नहीं दे रही थीं,
पंख फैलाने को,
कुछ देर कोशिश करने के बाद उड़ गयी,
और जाकर बैठ गयी बाहर कपड़े सुखाने की तार पर,
उसकी हिलती-डुलती परछाईं मेरी डायरी में पड़ रही थी,
कुछ सोचकर दुबारा अन्दर आयी और फिर चढ़ गयी बुकशेल्फ पर,
इस बार बुकशेल्फ का नीचे का हिस्सा भी छाना उसने,
पर मेरी माँ के कमरे में आती ही उड़ गयी फुर्र से से,
माँ कह रहीं थीं,
अगर ये कमरा हमेशा खुला रहे तो वो यहाँ घोंसला ज़रूर बना लेगी.

धूप

दिन की धूप कभी इतनी उबाऊ नहीं थी,
जितनी आज लग रही है,
धूप भी चुपचाप मेरे कमरे तक आयी थी सुबह,
और धीरे-धीरे वापिस जा रही थी,
कभी-कभार आपस में हम खूब बतियाते थे,
परिंदों के किस्से, पहाड़ों के जुमले और नदियों की कहानी,
लेकिन आज उसके पास भी कहने के लिये कुछ नहीं है,
शायद उसका भी कोई अपना उससे बिछड़ गया है,
रूठ गया है,
धूप भी  तकलीफ में हैं,
इसलिए तो आज चुभ रही है...

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

लौटा दो सब कुछ !

लगभग सबकुछ लौटा चुके हो तुम,
पर थोड़ा-थोड़ा कुछ बाकी है,
वो थोड़ा बहुत कुछ है मेरे लिये,
पर मैंने कभी कहा नहीं,
आज कह रहा हूँ इसलिए गुस्ताखी माफ़,

क्या लौटा सकते हो वो रात,
जब मैं अपने दोस्त की याद में सिमटा रहा तुम्हारे कंधों पर,

क्या दुबारा मिल सकते हैं वो आंसू,
जो साथ रहते ख़ुशी और गम में बहे हैं,

क्या मिल सकती हैं वो पानी की बूंदें,
जो तुमने मेरे बदन से पोछीं हैं,

क्या पा सकता हूँ वो रेशम के तार,
जो रात भर जागकर हमने साथ बुने हैं,

जानता हूँ मुमकिन नहीं,
इसलिए तो कह रहा हूँ,
शायद तुम समझ जाओ,
कि जो बीत गया उस पर अपने कोई जोर नहीं...

चाँद और तुम

आज शाम टीवी पर देखा कि पूरनमासी का चाँद,
पिछली कई पूरनमासी की रातों के मुकाबले,
काफी बड़ा और खूबसूरत दिख रहा है,
देर रात को मैं भी चढ़ा छत पर कि देखूं तो,
आखिर क्या माजरा है?
बिलकुल मेरे सिर के ऊपर था वो,
जब नज़र उठाकर मैंने देखा तो,
तुम्हारा गुलाबी चेहरा नज़र आया उसमें,
ठीक वैसा जो तुम "उसके" साथ घूमने जाने के लिए,
लिये बैठी थीं,
उस रोज़ तुम्ही ने बताया था मुझे,
कि  तुम्हें जाना है कहीं "उसके" साथ,
धीमा हो गया था मैं, मंद पड़ गयी थी धड़कन,
काँप गया था! जैसा अभी काँप रहा हूँ सर्द रात में...

13 जनवरी

उस रात जैसे हैवान बैठे थे आँखों में,
जिनके बोझ से ज़मीर की पलकें बंद हो गयीं थी,
इंसानी जिस्म में उतारकर एक-दूसरे का खून पीने को बेताब थे वो,
एक मौका भी मिला, जिस छोड़ना मुमकिन न था दोनों के लिए,
गहरे दांत उतार दिए थे, रूह तक हैवानों ने,
के जिसके निशाँ अब तक झांकते हैं,
दोनों जिस्म की दरारों से,
किसी धागे सा गुच्छा बनकर, उलझ गए थे वो,
चूस लिया था मोहब्बत के हर लम्हें का कतरा,
और जब सुलझे तो, बेमानी सा कर दिया था,
वो रिश्ता,
जिसे मैंने सीने से लगाकर और तुमने छाती में छुपाकर,
पाल-पोसकर बड़ा किया था, अपने बच्चे की तरह,
वो बच्चा,
रोज़ अपनी माँ के बारे में पूछता है,
और मैं उसे बहला कर सुला देता हूँ...