मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

श्रुति

रोशनदान से,
छनकर आता हुआ,
धूप का एक कतरा,
फर्श पर पड़े-पड़े,
तुम्हारे नाम के शुरूआती लफ़्ज़ की,
शक्ल लेता गया,
कि जैसे!
वो भी तुम्हें,
कमरे में रखे रेडियो पर,
"सुनकर,"
अपनी खुशी इज़हार करते हो,
बाखुदा!
"दिल चाहता है,"
कि इस तरह,
तुम हर दिल के रोशनदान से,
छनकर,
दिन के एक पहर में,
उन्हें रोशन कर जाया करो...

आवाज़

तुम कभी रेडियो पे बोलती हो,
तो कभी फोन पे बोलती हो,
कभी मिलो कहीं, सामने बैठे और बोलो,
तो दिल को भी अच्छा लगे..

सोमवार, 19 दिसंबर 2011

सफ़र

मैं रात भर उसे तकता रहा,
वो पूरी रात बेफ़िक्री से सोती रही,
इस तरह एक खूबसूरत लड़की ने,
मुझे सारी रात सोने न दिया..!!!

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

सच में तू बड़ा हो गया है...दूसरी किश्त

सच में तू बड़ा हो गया है...पहली किश्त से आगे...रात में नींद आँखों के आस-पास मंडराते हुए कब आँखों से लग गयी, पता ही नहीं चल पाया. खैर, सुबह हो चुकी थी और मैं जिस लॉज में रात को रुका था सुबह होते ही उसमें रहने वाले बाकी लोग दिखाई दिए. इस लॉज में रहने वाले ज्यादातर लोग कहीं न कहीं जॉब करते हैं, जैसे कोई पुलिस में है, कोई फाइनेंस में. ये लोग यहाँ पर स्थायी तौर पर रहते हैं. आज भी जब पांच साल बाद जब वो सब कुछ लिख रहा हूँ जो घट चुका है तो भी वो दृश्य एकदम ताज़ा हैं जैसे इस रात का तीसरा पहर. खैर, सुबह हो चुकी थी लेकिन मेरी नींद तब खुली जब मेरे मोबाइल पर किसी का कॉल आया. मैं तैयार होकर उस जगह के लिये निकल पड़ा, जहाँ कल अपनी खोज बंद कर दी थी. मुझे जिस व्यक्ति ने अपनी दुकान पर आने के लिये कहा था, उसके मुताबिक मुझे १२ बजे तक मुझे उसकी दुकान पहुंचना था. चूँकि मैं लॉज से बहुत जल्दी निकल गया था इसलिए चाय पीकर और नाश्ता करके मैं अपनी खोज में लग गया. एक दुकान में पहुंचकर जब मैं अपने भाई का फोटो दिखा रहा था, तब एक बच्चे ने कहा कि कल रात में गार्डन के पास एक डेड बॉडी मिली है. उसकी इस बात से मेरी खोज में कोई अंतर नहीं आया. ११ बजे में उस प्रेस वाले की दुकान पहुंचा जहाँ से मेरे भाईसाहब रोज निकला करते थे. मैं कुर्सी लगाकर उस सड़क पर टकटकी लगाकर बैठ गया. रोज १२ से १२:३० के बीच वहाँ से निकलने वाले मेरे भाईसाहब उस दिन वहाँ से नहीं निकले.  मैंने १ बजे तक वहाँ इंतज़ार किया और फिर गणेशपेठ पोलिस स्टेशन पहुँच गया. वहाँ मेरे भाईसाहब की तस्वीर दिखाई. मैंने उनसे गार्डन वाली घटना का ज़िक्र किया और डेड बॉडी को देखने की बात ज़ाहिर की. उसके लिये मुझे नागपुर के शासकीय मेडिकल हॉस्पिटल जाने को कहा गया. ऑटो से मैं वहाँ पहुंचा और १९ साल से जिस भाई को अपने आस-पास हँसते-रोते, खेलते-कूदते देखा था उस वक्त वो मेरा बड़ा भाई, मेरी आँखों के सामने लगभग पांच फिट दूर एक स्ट्रेचर पर अचेत लेटा हुआ था. उसके मृत शरीर पर कपड़े का एक भी टुकड़ा नहीं था और न ही उस पर कफ़न डाला गया था. मेरी आँखों तक उस वक्त सिर्फ दो ही आंसू पहुँच पाए थे, जिन्हें मैंने ठीक से बाहर भी नहीं आने दिया. मैंने वहाँ मौजूद कर्मचारी और पोलिसकर्मी से कहा कि ये मेरे भाई हैं, उन लोगों ने दुबारा शिनाख्त करने के लिये कहा. मैंने तब भी कहा कि मैं किसी भी तरफ़ से भी देखूँ , ये मेरे भाई ही रहेंगे...मैं इन्हें यहाँ से ले जाना चाहता हूँ, जो भी कार्यवाही है उसे शुरू करें. कुछ कागज़ी कार्यवाही शुरू हुई और मैंने पूछा कि पोस्टमोर्टम हुआ या नहीं? जवाब न में मिला, तब मैंने पोस्टमोर्टम करवाने की इच्छा जतायी और मेरे भाई का पोस्टमोर्टम मेरे सामने ही हुआ. पुलिसकर्मियों ने इस दुर्घटना की सूचना परिवारवालों को देने को कही. उन्हें जब ये पता चला कि मेरे पिताजी भी पोलिस में हैं तो उन्होंने इस सूचना को प्रेषित करने के लिये जोर दिया. मैं बहुत असहाय महसूस कर रहा था, कि किस तरह पिताजी को इस दुर्घटना की सूचना दूँ? कैसे माँ से कहूँ कि भैया अब इस दुनिया में नहीं हैं. पिताजी उस वक्त मंडला में पदस्थ थे और माँ जबलपुर में थीं. मैंने साहस बटोरकर पिताजी को इस बात की जानकारी दी, उस वक्त पिताजी रोये नहीं बल्कि उन्हें मेरी चिंता होने लगी. वो जानते थे कि बड़े भैया मेरे लिये भाई से कहीं बढ़कर थे. पिताजी ने नागपुर आने की बात की लेकिन मैंने उन्हें आश्वाशन दिया कि मैं भाईसाहब को लेकर आऊँगा. पापा ने मुझे गाँव आने के लिये कहा. नागपुर के पुलिसकर्मियों ने मेरा पूरा सहयोग दिया और सारी कार्यवाही जल्दी करके मुझे स्वतन्त्र कर दिया. मैंने एक गाड़ी का इंतजाम कर लिया था और उस गाड़ी में मैं मेरे भाई को लेकर शाम के छः बजे के आस-पास नागपुर से निकल पड़ा था अपने गाँव के लिये और निकलते हुए लॉज से अपना सामान भी उठा लिया था. रास्ते में ड्राइवर और उसका हेल्पर भोजन करने के लिये रुके. उन्होंने मुझसे भोजन करने को कहा, उन्हें ये बात बता दी गयी थी कि मैंने नाश्ते के बाद कुछ खाया नहीं है. ड्राइवर ने कहा कि आप अभी घर पहुंचेंगे तो ऐसी हालत में वहाँ कुछ भी नहीं खा पाएंगे. ऐसी स्थिति में अपनी सेहत का ध्यान रखना बेहद ज़रुरी है. मैंने थोड़ा दाल-चावल वहाँ खाया और फिर वहाँ से निकल गए. थोड़ी देर में हम गाँव पहुंचे. रात के लगभग १०:३० बज रहे थे और गाँव में हर तरफ सन्नाटा छाया हुआ था. गाँव में खामोशी का होना कोई नई बात नहीं थी लेकिन उस रात वो खामोशी बहुत कष्टदायक थी. मैं अपने दादाजी के घर पहुंचा, गाँव के बहुत सारे लोग वहाँ एकत्रित थे. सभी को मेरा और मेरे भाई का इंतज़ार था.  मेरे भाई का शव गाड़ी से उतारा गया और घर के बीच वाले कमरे में रखा गया. मैंने गाड़ी से उतरकर अपने पिताजी की ओर देखा, ये शायद दूसरी बार था जब मैंने उन्हें रोते हुए देखा था. एक बार मेरे दादाजी के गुजर जाने पर और दूसरा आज. मेरे पिताजी ने मुझे सीने लगते हुए कहा कि आज तुमने बहुत बड़ा काम किया है. मेरी माँ भी वहीँ थी और बेहद दुखी थीं, उन्होंने कहा कि तूने अपने कहे हुए काम को पूरा किया है. अपने भाई को लेकर आया है. मैं किसी से कुछ नहीं कह पाया और दूसरे कमरे में चला गया. वहाँ मेरे बाकी रिश्तेदार थे, जो रिश्ते में मेरे भाई-बहिन लगते थे. सबका रो-रो कर बुरा हाल था, बस मेरी ही आँखें सूखी हुई थीं. मुझे रोने के लिये कहा गया लेकिन मैं नहीं रो पाया. क्योंकि उस समय मेरे मम्मी-पापा उसी कमरे में थे. मैंने अपने मामाजी को उन्हें वहाँ से ले जाने के लिये कहा, उनके जाने के बाद मैंने अपने भाई का चेहरा अपने हाथों में लेकर उसके दुलार को महसूस किया जो उसने सालों-साल तक मुझ पर लुटाया था. उस समय मेरी आँखों से आँसू तेजी से निकल पड़े और काफी देर तक नहीं थमे. अपने आँसू पोछकर मैं उस कमरे में गया जहाँ मेरे मम्मी-पापा मौजूद थे, वो उस वक्त रो रहे थे और मुझे देखते ही चुप हो गए. मैं बिना कुछ कहे वहाँ से फिर अपने भाई-बहिनों के कमरे में चला गया. जैसे-तैसे वो रात कट गयी और सुबह भैया के अंतिम यात्रा की तैयारी होने लगी. मेरी बहिने भैया के लिये फूलों की माला तैयार कर रही थीं, मामाजी बाँस के ऊपर आसन बिछा रहे थे, जिस पर भैया को लिटाया जाना था. भैया के शरीर को आसन पर लेटाकर उन पर इत्र छिड़का गया और उन्हें फूलों से ढँक दिया गया. मेरे पिताजी उस अंतिम यात्रा में आना चाहते थे लेकिन रीति-रिवाजों के चलते उन्हें नहीं आने दिया गया. मेरी मम्मी ने एक बार जोर देकर कहा कि अगर वे जाना चाहते हैं तो उन्हें जाने दिया जाए लेकिन सभी ने मना कर दिया. मेरी माताजी के कहने पर ही एक फोटोग्राफर का इंतजाम किया गया था जो उस अंतिम यात्रा के दृश्य अपने कैमरे में कैद कर रहा था. उस अंतिम यात्रा में पूरा गाँव शामिल हुआ और भैया को लेकर हम अपने गाँव के दाह-संस्कार स्थल पहुँचे. वहाँ पहुंचकर मैंने नदी में स्नान किया और पानी से भरा छोटा मटका लेकर चिता के फेरे लगाये. उसके बाद मैंने ही मुखाग्नि दी, मुखाग्नि देने के बाद मैं फूट-फूटकर रो पड़ा और थोड़ी देर में चुप भी हो गया. मृत शरीर के आत्मा की शांति की प्रार्थना करने के बाद हम सभी घर को लौट गए...

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

जाम

मैं इक प्याला हूँ ज़िन्दगी का,
और खालीपन से भरा बैठा हूँ,
मेरी तन्हाई के लम्हे डूबे हुए हैं इसमें,
जो बर्फ की तरह पिघल भी रहे हैं और घुल भी रहे हैं.

बुधवार, 30 नवंबर 2011

मुश्किल

मेरी पहचान बन गयी है मेरे सपनों के लिए मुसीबत का सबब,
फिर नई पहचान बनाने के लिए कुछ मुझे दिन गुमनाम होना पड़ेगा!

मेरा वक्त

वो वक्त भी नज़दीक आता दिख रहा है,
जब लोग रस्ता देखेंगे मेरे आने का...

रविवार, 27 नवंबर 2011

ज़िक्र

ज़िक्र तेरा जब किसी दर पे सर-ए-सुबह उठा है,
निकलते-निकलते वहाँ से शाम हुई है..

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

छोटा सा किस्सा

दौर-ए-कुल्फ़त* में किसी से उल्फ़त क्या तकी जाए..
सर्द मौसम है और रात भी गाढी है,
बेहतर है मुँह ढंके और सोया जाए...


कुल्फ़त-आफत/मुश्किल
उल्फ़त - प्यार/मोहब्बत

गुरुवार, 24 नवंबर 2011

असर

मेरे चाहने वालों की तादाद दिन-ब-दिन बढ़ रही है,
मुझसे नफ़रत करने वालों, अपनी दुआओं में थोड़ा और असर पैदा करो.

सिगार


जब हाथ में आखिरी सिगार सुलग रहा होता है,
तो मन कहता है कि काश ये थोड़ी देर और सुलगता,
जब तपिश उँगलियों तक पहुँचती है,
तो दिल कहता है कि काश ये आखिरी छोर तक जलता,
पर सिगार को भी पता होता है कि उसे अब बुझना है,
ये ज़िन्दगी भी इसी तरह सुलग रही है,
और कब ये छोर तक आ पहुंचेगी,
पता भी नहीं चलेगा,
इसलिए...हर कश का पूरा मज़ा लो,

मंगलवार, 22 नवंबर 2011

तेवर


आज पूरी दुनिया से कर सकता हूँ मैं दुश्मनी,
फिलहाल कोई दोस्ती का हाथ आज मेरी तरफ मत बढ़ाना!

सोमवार, 21 नवंबर 2011

हँसना-रोना

किसी ने आज मुझसे पूछ ही लिया,
कि आपको कभी रोना नहीं आता क्या,
मेरे पास कोई जवाब नहीं था,
क्या करता! मैं जोर से हँस पड़ा...

रविवार, 20 नवंबर 2011

अफवाहें!

अफवाहों को बाज़ार गर्म है,
तुम अपना दामन बचा कर चलना,
कहीं ज्यादा तपिश से आग न पकड़ ले!

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

वो रात!


उसकी सोती हुयी साँसों में भी सरगम सुनायी देती है,
खुदा ने वक्त निकालके गढ़ी हो वो रुबायी लगती है,
पूरी रात मैं उसे ताकते रहा और सुबह हो गयी,
ये बात पूरी तरह सच है पर एकदम करिश्माई लगती है ...

शनिवार, 5 नवंबर 2011

ख्याली दुनिया

जब मैं सोने जाता हूँ अपने अँधेरे कमरे में,
मोबाइल में रेड Key दबाकर देखता हूँ वक्त,
और उससे होने वाली मद्धम रोशनी में,
कुछ ख्याल से चले आते हैं बेवक्त,
जो ठीक से नज़र भी नहीं आते,
और नींद के झोंके छिटककर गिर जाते हैं दूर,
फिर सोचता हूँ कि सुबह उठा लूँगा मैं उनको,
पर तब तक वो गायब हो जाते हैं,
ऐसे, जैसे थे ही नहीं कभी,
या कोई ख्यालों का चोर उठा ले गया उन्हें,
और बेच दिया हो किसी ऐसे बाज़ार में,
जहाँ से कोई मालगाड़ी उन्हें भरकर,
निकल पड़ती है किसी ऐसी दुनिया में,
जहाँ हर ख्याल हकी़कत हो जाता है,
जे.के.रॉलिंग के जादुई उपन्यास की तरह,
इसी वजह से पिछले कई दिनों के ख्यालों को,
सहेज नहीं पाया मैं अपनी डायरी में,
अगर मेरा कोई ख्याल तुम्हें दिखाई दे,
तो उसे कान से पकड़कर रख लेना अपने पास,
मैं लौटते हुए, उसे अपने घर लेता आऊंगा!

Smiley

क्यों वो नज़र मेरी हर इक हरकत पे रखती है..
क्या ये सही है कि वो मुझपे नज़र रखती है!

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

ग़लतफ़हमी

तुम्हारी दुनिया की रौनक भी मैं,
तुम्हारी साँसों की खलिश भी मैं,
ज़रा सोचकर देखो,
मेरे बगैर तुम्हारी दुनिया कितनी सूनी है!

मंगलवार, 25 अक्तूबर 2011

तस्वीरों की छोटी सी ड्राइव


यादों का तो पता नहीं,
लेकिन तस्वीरों में तुम,
अभी भी एकदम वैसी ही ताज़ी हो,
उस फूल की तरह,
जो मैंने ताज़ा-ताज़ा तोड़कर तुम्हें दिया था,
और तुमने उसे अपने बालों में लगाकर,
मुस्कुराते हुए फोटो क्लिक किया था..

गुरुवार, 20 अक्तूबर 2011

ख्वाहिश

इससे पहले कि मेरे ज़हन में आने वाला तेरा कोई ख़याल,
नज़्म, शे'र, रूबाई या गज़ल की शक्ल अख्तियार करे,
बेहतर है कि नींद मुझे अपनी बाहों में समेट ले!

मंगलवार, 18 अक्तूबर 2011

तो वो ही सही!

न होने से कुछ होना अच्छा...
गलतफ़हमी है, तो वो ही सही!
मैं गर कुछ बोलूं, तो गलत बात है,
अगर है, तो वो ही सही !

तेरे मिलने से, न मिलना अच्छा...
मुझे तकलीफ़ है, तो वो ही सही!
मैं गर मिलना चाहूँ, तो गलत बात है,
अगर है, तो वो ही सही!

चार किताब पढ़के, वो बन गया अच्छा...
पर रह गया वहशी, तो वो ही सही!
मैं गर शफ्क़त* हो जाऊँ, तो गलत बात है,
अगर है, तो वो ही सही!

*इंसान/इंसानियत

बिसात

खेल लिया!
खुश हो गए!
मन भर गया!
चलो अब मेरी बारी,
मैं खुदा तो नहीं हूँ,
पर मुझमे इतनी ताक़त है,
कि पल में बना सकता हूँ,
तुम्हें खिलौना!
पर मैंने कहा ना,
मैं खुदा तो बिलकुल नहीं हूँ,
न पत्थर पे तराशा हुआ,
न चादर में ढका हुआ,
न तज़्मीं में गुथा हुआ,
न पन्नों में छपा हुआ,
मैं सांस लेता हूँ,
इसी ज़मीं पर,
जहाँ ज़िन्दगी में,
खुशी की अहमियत,
जानता हूँ मैं भी,
वर्ना,
तुम्हारी ज़िन्दगी होती रंगमंच,
और कहानी होती मेरी लिखी,
पात्र सारे कल्पना से परे,
लेकिन हकीकत से जुड़े,
घटनाएं ऐसी जो दहलातीं कभी दिल,
तो कभी कर देती दिमाग खराब,
पर अभी मेरा मन नहीं है,
खुदको बहलाने का,
जाओ!
छोड़ दिया!
अब खेलो खुदके साथ!

तमाशबीन नींद


नींद भी तेरी ही तरह हो चली है,
थोड़ी देर आँखों में रही,
फिर कुछ देर में ओझल,
लगता है जैसे अफ़ीम खाकर,
ये भटक रही है एक दर से दूसरे दर,
ये भी आज़मा रही है मुझे,
दूर खड़े होकर देख रही है तमाशा,
किस बेचैनी से मैं उठता हूँ,
टहलता हूँ कमरे में,
कि लैपटॉप पर,
किस तरह चल रही हैं,
मेरी अधजगी उँगलियाँ,
कैसे पलक नींद की समेटे सिलवट,
है इस आस में,
कि कुछ देर बाद,
फिर से यहाँ डेरा होगा नींद का,
पर क्या बीच रात में,
कोई इस तरह सताता है...

सोमवार, 17 अक्तूबर 2011

तुमसे उम्मीद


नफ़रत है मुझे झूठ से,
बेहतर है कि,
तू मेरे ख़्वाब में ही रह,
तू सच भी वहीं है,
और सच्चा भी..!!

रविवार, 16 अक्तूबर 2011

तुम्हारा ख़याल


मुझे जब भी तेरा ख़याल आता है,
मैं भर जाता हूँ अदब से,
गूंजने लगती हो तुम मेरे कानों में,
किसी
आयत की तरह...

तुम्हारी आदत


सुना, कि आज तुम इस गली से गुज़रे थे,
तब, मैं उस वक्त छत पे चाँदनी में बैठा था,
थोड़ा रुक जाते, मेरे लिये,
पर तुमने तो रुकना सीखा ही नहीं,
तुम्हारी इसी आदत पर,
इक बार पहले भी बात हो चुकी है,
देखो! इस आदत के चलते,
कहीं ऐसा न हो,
कि तुम बहुत आगे निकल जाओ,
और मैं फिर से यहाँ रह जाऊं...एकदम तन्हां!

शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2011

मैं हिरोशिमा हूँ

मैं वो हिरोशिमा हूँ,
जहाँ कई बार परमाणु बरसाया गया,
जो बसने की चाह में उजड़ता गया,

मैं वो हिरोशिमा हूँ,
जो कई बार गिरा फिर उठ खड़ा हुआ,
जिसकी ओर हाथ बढा फिर खींचा गया,

मैं वो हिरोशिमा हूँ,
जो धूल के गुबार में भी शादाब रहा,
और रेडियेशन में भी पनपता रहा.

मैं वो हिरोशिमा हूँ,
जिसकी जुस्तजू तो बहुत रहीं,
लेकिन रंज कुछ भी न रहा..

मैं वो हिरोशिमा हूँ,
जिसके अमरीका तो बहुत हुए,
पर नागासाकी न कोई हुआ,

मैं वो हिरोशिमा हूँ,
जिसका परमाणु कुछ न कर सके,
अब किसी मिसाइल से क्या डरना!

ज़िन्दगी का ज़ेरोक्स

जब ज़िन्दगी किसी के हाथ में दी जाये,
तो बेहतर है उसकी ज़ेरोक्स करा ली जाये,
क्या पता! उससे गुम हो जाये तो ?

मैंने दी है अपनी ज़िन्दगी,
एक नहीं-कई बार,
भरोसेमंद हाथों में,
जो हर बार गुमी,
और अब मेरे पास,
सिर्फ मेरी ज़िन्दगी का ज़ेरोक्स है!

मंगलवार, 11 अक्तूबर 2011

वफ़ा

मैं कोई पीर, पयम्बर या पुरया नहीं...
फिर कैसे इतनी सदाक़त से कह देता है वो भला-बुरा मुझे...

शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2011

हौसला

मुझे मेरी हद में रहने दो,
अगर मैंने अपनी हद छोड़ी,
तो तुम्हें बेहद अफ़सोस होगा...

गुरुवार, 6 अक्तूबर 2011

कशमकश

इस तरह चुप रहकर मेरी बेचैनी मत बढाओ..
चलो यही कह दो कि तुम मुझे भूल जाओ..
कुछ दिनों का मिलना-जुलना था, हो गया,
अब मैं अपने और तुम अपने रस्ते जाओ..
मैं मजबूर हूँ तुम्हें समझा नहीं सकती,
हो सके तो मेरी चुप्पी को ही समझ जाओ...

एक दिन में ही तुम्हारे बिन रहना सीख लिया,
हो सके तो तुम भी मेरे बिना रहना सीख जाओ...

स्याह रात

इस स्याह रात के पन्नों में,
उजला कुछ भी नहीं दिखता,
बस दूर-दूर तक मैं ही मैं,
फिर खामोशी ही खामोशी...

आवाज़ भी मैंने तुझको,
मुझे मेरी गूँज सुनायी दी,
बस दूर-दूर तक मैं ही मैं,
फिर खामोशी ही खामोशी...

रविवार, 2 अक्तूबर 2011

Good Sunday

उनके नाज़ुक से मसीह दिल पर,
चुभ गए मेरे कुछ लफ्ज़ काँटों जैसे,
वो लम्हा-लम्हा तड़प रहे हैं,
मैं क़तरा-क़तरा गुज़र रहा हूँ...

रब राक्खा


गर उन्हें दी है इतनी नज़ाकत,
तो कुछ जमाल हमें भी दे,
कर सकूँ तेरे तोहफे की हिफ़ाज़त,
कुछ कमाल हमें भी दे...

शनिवार, 1 अक्तूबर 2011

कॉफी हाउस की टेबल

काफी चौड़ी हो गयी हैं कॉफी हाउस की टेबल,   
कोई जितना नज़दीक आना चाहे उतना ही दूर कर देती हैं उसे ,
पहले तो यहाँ दिल से दिल और लफ्ज़ से लफ्ज़ जुड़ा करते थे,
लगता है दुनिया वालों ने इनके भी कान फूँक दिए हैं...

सोमवार, 26 सितंबर 2011

Attiutude

खुदा को मेरी बहुत फ़िक्र है,
खुश करने के बाद,
कर देता है गमज़दा मुझे!

रविवार, 25 सितंबर 2011

महजबीं

कॉफ़ी टेबल पर,
दो दरिया बांधे,
अनबुझे काजल को देखा,
सुर्ख़ कपड़ों में लिपटे,
सफ़ेद कमल को देखा,
मेरे लफ़्ज़ों से कहीं ज्यादा खूबसूरत है,
मेरी डायरी के पन्नों से निकली,
उस ग़ज़ल को मुझसे बतियाते,
कभी नज़र चुराते और मुस्कुराते देखा...


शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

तिलिस्म

कई मर्तबा आके लौट गया तुझे खिड़की पे देख के,
पहले कभी संगमरमर को मुस्कुराते नहीं देखा था,
ये ताज-महल में किसने जान फूँक दी???

सोमवार, 5 सितंबर 2011

बारिश और तुम


बारिश दबे पाँव आती है,
और अपनी मौजूदगी के निशां,
खिड़की पर छोड़ जाती है,
जो कुछ देर बाद,
खुद-बा-खुद गायब भी हो जाते हैं,
पर तुम तो मेरी ज़िन्दगी में, 
अब भी नुक्ते की तरह समाई हो.

रविवार, 28 अगस्त 2011

एक्स-गर्लफ्रेंड


रोज-रोज उसकी आती यादों में आँखों का पानी जलता है,
जब वो किसी और से मिलती है तो दिल से धुँआ निकलता है,
कभी रात भर जो हमसे मोबाइल पर बतयाती थी,
आजकल उसका नंबर डायल करने पर हमेशा व्यस्त मिलता है....

शनिवार, 27 अगस्त 2011

विल पॉवर


देश के भविष्य का अंदाजा कुछ इस तरह लग जाता है,
जब लड़कों के कंधों पर थोड़ा बोझ डाला जाता है,
लोग यूँ ही नहीं कहते कि मोहब्बत में बड़ी ताक़त होती है,
क्योंकि ६० किलो की गर्ल फ्रैंड उठाने में भारी नहीं लगती,
लेकिन १६ किलो का गैस सिलेंडर उठाने में दम निकल जाता है...

सोमवार, 14 मार्च 2011

रैने

चाँद के इतना करीब,
पहले तो नहीं देखा था उसे,
जाने क्यों; आज इतना लढ़या रहा है,
जो नाम था रखा, उसका मतलब तो पता नहीं,
पर इतना याद है, कि  तुम्हारे और मेरे नाम से,
बीनकर कुछ शब्द,
रख दिए थे किनारे और बना दिया था कुछ...  
एक मार्च की बीती हुई शाम को चाँद के करीब देखा था तुम्हें...

रविवार, 30 जनवरी 2011

अहसां

अपने बाकी अहसानों से तुझे आज़ाद कर दिया,

इस शहर पर एक और अहसां कर दिया..

बुधवार, 26 जनवरी 2011

देशभक्ति का कीड़ा


भारतीय गणतंत्र का इकसठवा जन्मदिन मन गया,
देशवासियों ने राष्ट्र गान को फिर से याद किया,
ये देशभक्ति पन्द्रह अगस्त को अंगडाई लेकर फिर सो जायेगी,
और अगर पॉपकॉर्न लेने से समय बच गया,
तो मूवी थियेटर में राष्ट्र गान के वक्त खड़े हो जायेगी...

बुधवार, 12 जनवरी 2011

भरोसा

चार दिन और मुझसे नफ़रत कर लो, फिर तुम खुद चाहने के बहाने तलाशोगे...