मंगलवार, 25 अक्तूबर 2011

तस्वीरों की छोटी सी ड्राइव


यादों का तो पता नहीं,
लेकिन तस्वीरों में तुम,
अभी भी एकदम वैसी ही ताज़ी हो,
उस फूल की तरह,
जो मैंने ताज़ा-ताज़ा तोड़कर तुम्हें दिया था,
और तुमने उसे अपने बालों में लगाकर,
मुस्कुराते हुए फोटो क्लिक किया था..

गुरुवार, 20 अक्तूबर 2011

ख्वाहिश

इससे पहले कि मेरे ज़हन में आने वाला तेरा कोई ख़याल,
नज़्म, शे'र, रूबाई या गज़ल की शक्ल अख्तियार करे,
बेहतर है कि नींद मुझे अपनी बाहों में समेट ले!

मंगलवार, 18 अक्तूबर 2011

तो वो ही सही!

न होने से कुछ होना अच्छा...
गलतफ़हमी है, तो वो ही सही!
मैं गर कुछ बोलूं, तो गलत बात है,
अगर है, तो वो ही सही !

तेरे मिलने से, न मिलना अच्छा...
मुझे तकलीफ़ है, तो वो ही सही!
मैं गर मिलना चाहूँ, तो गलत बात है,
अगर है, तो वो ही सही!

चार किताब पढ़के, वो बन गया अच्छा...
पर रह गया वहशी, तो वो ही सही!
मैं गर शफ्क़त* हो जाऊँ, तो गलत बात है,
अगर है, तो वो ही सही!

*इंसान/इंसानियत

बिसात

खेल लिया!
खुश हो गए!
मन भर गया!
चलो अब मेरी बारी,
मैं खुदा तो नहीं हूँ,
पर मुझमे इतनी ताक़त है,
कि पल में बना सकता हूँ,
तुम्हें खिलौना!
पर मैंने कहा ना,
मैं खुदा तो बिलकुल नहीं हूँ,
न पत्थर पे तराशा हुआ,
न चादर में ढका हुआ,
न तज़्मीं में गुथा हुआ,
न पन्नों में छपा हुआ,
मैं सांस लेता हूँ,
इसी ज़मीं पर,
जहाँ ज़िन्दगी में,
खुशी की अहमियत,
जानता हूँ मैं भी,
वर्ना,
तुम्हारी ज़िन्दगी होती रंगमंच,
और कहानी होती मेरी लिखी,
पात्र सारे कल्पना से परे,
लेकिन हकीकत से जुड़े,
घटनाएं ऐसी जो दहलातीं कभी दिल,
तो कभी कर देती दिमाग खराब,
पर अभी मेरा मन नहीं है,
खुदको बहलाने का,
जाओ!
छोड़ दिया!
अब खेलो खुदके साथ!

तमाशबीन नींद


नींद भी तेरी ही तरह हो चली है,
थोड़ी देर आँखों में रही,
फिर कुछ देर में ओझल,
लगता है जैसे अफ़ीम खाकर,
ये भटक रही है एक दर से दूसरे दर,
ये भी आज़मा रही है मुझे,
दूर खड़े होकर देख रही है तमाशा,
किस बेचैनी से मैं उठता हूँ,
टहलता हूँ कमरे में,
कि लैपटॉप पर,
किस तरह चल रही हैं,
मेरी अधजगी उँगलियाँ,
कैसे पलक नींद की समेटे सिलवट,
है इस आस में,
कि कुछ देर बाद,
फिर से यहाँ डेरा होगा नींद का,
पर क्या बीच रात में,
कोई इस तरह सताता है...

सोमवार, 17 अक्तूबर 2011

तुमसे उम्मीद


नफ़रत है मुझे झूठ से,
बेहतर है कि,
तू मेरे ख़्वाब में ही रह,
तू सच भी वहीं है,
और सच्चा भी..!!

रविवार, 16 अक्तूबर 2011

तुम्हारा ख़याल


मुझे जब भी तेरा ख़याल आता है,
मैं भर जाता हूँ अदब से,
गूंजने लगती हो तुम मेरे कानों में,
किसी
आयत की तरह...

तुम्हारी आदत


सुना, कि आज तुम इस गली से गुज़रे थे,
तब, मैं उस वक्त छत पे चाँदनी में बैठा था,
थोड़ा रुक जाते, मेरे लिये,
पर तुमने तो रुकना सीखा ही नहीं,
तुम्हारी इसी आदत पर,
इक बार पहले भी बात हो चुकी है,
देखो! इस आदत के चलते,
कहीं ऐसा न हो,
कि तुम बहुत आगे निकल जाओ,
और मैं फिर से यहाँ रह जाऊं...एकदम तन्हां!

शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2011

मैं हिरोशिमा हूँ

मैं वो हिरोशिमा हूँ,
जहाँ कई बार परमाणु बरसाया गया,
जो बसने की चाह में उजड़ता गया,

मैं वो हिरोशिमा हूँ,
जो कई बार गिरा फिर उठ खड़ा हुआ,
जिसकी ओर हाथ बढा फिर खींचा गया,

मैं वो हिरोशिमा हूँ,
जो धूल के गुबार में भी शादाब रहा,
और रेडियेशन में भी पनपता रहा.

मैं वो हिरोशिमा हूँ,
जिसकी जुस्तजू तो बहुत रहीं,
लेकिन रंज कुछ भी न रहा..

मैं वो हिरोशिमा हूँ,
जिसके अमरीका तो बहुत हुए,
पर नागासाकी न कोई हुआ,

मैं वो हिरोशिमा हूँ,
जिसका परमाणु कुछ न कर सके,
अब किसी मिसाइल से क्या डरना!

ज़िन्दगी का ज़ेरोक्स

जब ज़िन्दगी किसी के हाथ में दी जाये,
तो बेहतर है उसकी ज़ेरोक्स करा ली जाये,
क्या पता! उससे गुम हो जाये तो ?

मैंने दी है अपनी ज़िन्दगी,
एक नहीं-कई बार,
भरोसेमंद हाथों में,
जो हर बार गुमी,
और अब मेरे पास,
सिर्फ मेरी ज़िन्दगी का ज़ेरोक्स है!

मंगलवार, 11 अक्तूबर 2011

वफ़ा

मैं कोई पीर, पयम्बर या पुरया नहीं...
फिर कैसे इतनी सदाक़त से कह देता है वो भला-बुरा मुझे...

शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2011

हौसला

मुझे मेरी हद में रहने दो,
अगर मैंने अपनी हद छोड़ी,
तो तुम्हें बेहद अफ़सोस होगा...

गुरुवार, 6 अक्तूबर 2011

कशमकश

इस तरह चुप रहकर मेरी बेचैनी मत बढाओ..
चलो यही कह दो कि तुम मुझे भूल जाओ..
कुछ दिनों का मिलना-जुलना था, हो गया,
अब मैं अपने और तुम अपने रस्ते जाओ..
मैं मजबूर हूँ तुम्हें समझा नहीं सकती,
हो सके तो मेरी चुप्पी को ही समझ जाओ...

एक दिन में ही तुम्हारे बिन रहना सीख लिया,
हो सके तो तुम भी मेरे बिना रहना सीख जाओ...

स्याह रात

इस स्याह रात के पन्नों में,
उजला कुछ भी नहीं दिखता,
बस दूर-दूर तक मैं ही मैं,
फिर खामोशी ही खामोशी...

आवाज़ भी मैंने तुझको,
मुझे मेरी गूँज सुनायी दी,
बस दूर-दूर तक मैं ही मैं,
फिर खामोशी ही खामोशी...

रविवार, 2 अक्तूबर 2011

Good Sunday

उनके नाज़ुक से मसीह दिल पर,
चुभ गए मेरे कुछ लफ्ज़ काँटों जैसे,
वो लम्हा-लम्हा तड़प रहे हैं,
मैं क़तरा-क़तरा गुज़र रहा हूँ...

रब राक्खा


गर उन्हें दी है इतनी नज़ाकत,
तो कुछ जमाल हमें भी दे,
कर सकूँ तेरे तोहफे की हिफ़ाज़त,
कुछ कमाल हमें भी दे...

शनिवार, 1 अक्तूबर 2011

कॉफी हाउस की टेबल

काफी चौड़ी हो गयी हैं कॉफी हाउस की टेबल,   
कोई जितना नज़दीक आना चाहे उतना ही दूर कर देती हैं उसे ,
पहले तो यहाँ दिल से दिल और लफ्ज़ से लफ्ज़ जुड़ा करते थे,
लगता है दुनिया वालों ने इनके भी कान फूँक दिए हैं...