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श्रुति

चित्र
रोशनदान से,
छनकर आता हुआ,
धूप का एक कतरा,
फर्श पर पड़े-पड़े,
तुम्हारे नाम के शुरूआती लफ़्ज़ की,
शक्ल लेता गया,
कि जैसे!
वो भी तुम्हें,
कमरे में रखे रेडियो पर,
"सुनकर,"
अपनी खुशी इज़हार करते हो,
बाखुदा!
"दिल चाहता है,"
कि इस तरह,
तुम हर दिल के रोशनदान से,
छनकर,
दिन के एक पहर में,
उन्हें रोशन कर जाया करो...


आवाज़

तुम कभी रेडियो पे बोलती हो,
तो कभी फोन पे बोलती हो,
कभी मिलो कहीं, सामने बैठे और बोलो,
तो दिल को भी अच्छा लगे..

सफ़र

मैं रात भर उसे तकता रहा,
वो पूरी रात बेफ़िक्री से सोती रही,
इस तरह एक खूबसूरत लड़की ने,
मुझे सारी रात सोने न दिया..!!!

सच में तू बड़ा हो गया है...दूसरी किश्त

सच में तू बड़ा हो गया है...पहली किश्त से आगे...रात में नींद आँखों के आस-पास मंडराते हुए कब आँखों से लग गयी, पता ही नहीं चल पाया. खैर, सुबह हो चुकी थी और मैं जिस लॉज में रात को रुका था सुबह होते ही उसमें रहने वाले बाकी लोग दिखाई दिए. इस लॉज में रहने वाले ज्यादातर लोग कहीं न कहीं जॉब करते हैं, जैसे कोई पुलिस में है, कोई फाइनेंस में. ये लोग यहाँ पर स्थायी तौर पर रहते हैं. आज भी जब पांच साल बाद जब वो सब कुछ लिख रहा हूँ जो घट चुका है तो भी वो दृश्य एकदम ताज़ा हैं जैसे इस रात का तीसरा पहर. खैर, सुबह हो चुकी थी लेकिन मेरी नींद तब खुली जब मेरे मोबाइल पर किसी का कॉल आया. मैं तैयार होकर उस जगह के लिये निकल पड़ा, जहाँ कल अपनी खोज बंद कर दी थी. मुझे जिस व्यक्ति ने अपनी दुकान पर आने के लिये कहा था, उसके मुताबिक मुझे १२ बजे तक मुझे उसकी दुकान पहुंचना था. चूँकि मैं लॉज से बहुत जल्दी निकल गया था इसलिए चाय पीकर और नाश्ता करके मैं अपनी खोज में लग गया. एक दुकान में पहुंचकर जब मैं अपने भाई का फोटो दिखा रहा था, तब एक बच्चे ने कहा कि कल रात में गार्डन के पास एक डेड बॉडी मिली है. उसकी इस बात से मेरी खोज में…

जाम

मैं इक प्याला हूँ ज़िन्दगी का,
और खालीपन से भरा बैठा हूँ,
मेरी तन्हाई के लम्हे डूबे हुए हैं इसमें,
जो बर्फ की तरह पिघल भी रहे हैं और घुल भी रहे हैं.