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:)

मुझे देखकर बड़े-बड़े,
अपना तख्तो-ताज संभालने लगते हैं,
ये तमाम लोग,
इस फ़कीर की नीयत पर,
बेवजह शक़ करते हैं ...

तुम्हारी छठी बरसी

चित्र
ये तुम्हारा प्यार नहीं तो और क्या है, कि जिस दिन तुम गए, उस दिन को भी, बरसों बाद, यादगार बनाने के लिए, तुमने छेड़ रक्खे हैं शगूफ़े, मैं पेशो-पेश में हूँ कि, आज की खुशी मनाऊं, या बरसों पहले के तुम्हारे जाने का गम, यकीन से कहता हूँ कि, अपने छोटे भाई को, ऐसी मुश्किल में डालकर, तुम मुस्कुराते ज़रूर होगे...है न भैय्याजी!
In the memory of Late Mr. Pushphar Singh Surya "My elder brother"  (30 June 1983- 8 December 2006)

यादों का डोज़

मैं चार दिन उसके घर में ही ठहरा था, इस दौरान उससे बात कुछ भी नहीं हुई, और होती भी कैसे? जिसके घर में आधा सैंकड़ा मेहमान हों, वहां बात हो भी तो क्या? यूँ कभी आते-जाते टकरा जाएँ तो, देख लेते थे एक-दूसरे को उस पल में इतना, कि पूरा पड़ जाता था बाकी दिन के लिए, फिर वो वक़्त आया, जब उसे सज-संवरके बैठना था मंडप में, बस, उससे कुछ वक़्त पहले, वो आयी थी मेरे कमरे में, बात कुछ भी नहीं की, मुझे देखा और दो आंसू बह निकले उसके, जो साथ में थोड़ा काजल बहाकर ले गए थे, लाली से लदे होंठों तक, आख़िरी बार इतना ही देखा था उसे, तब से रोज़ थोड़ा-थोड़ा करके पुराता* हूँ उसकी यादों को...

*(कुछ कमी होने पर भी, इस तरह से उपयोग करना कि उतने में ही पर्याप्त हो जाए)

मील का पत्थर

तुम्हें जब देखता हूँ,
तो लगता है ये शहर,
नगर और महानगर के बीच,
कहीं अटक गया है!

लोग अपने-अपने घरों से,
निकल तो गए हैं,
लेकिन रुके पड़े हैं कहीं,
शहर के रस्ते में,

छोटे-छोटे कपड़ें पहनें,
बौनी-बैनी सोच लिए,
क्या ये शहरी दिखने वाले लोग,
पहुँच पायेंगे बड़े शहर?
और पहुँच भी गए तो,
क्या वाकई में बड़े बन पायेंगे?


तुम्हें जब देखता हूँ,
तो लगता है ये शहर,
नगर और महानगर के बीच,
कहीं अटक गया है!


आपबीती

महीनों पहले,
मेरा आसमानी रंग का चश्मा,
खेल-खेल में टूट गया था,
तब से वो टूटा पड़ा हुआ है,
मेज़ की बीच वाली दराज़ में,
उसे जोड़ने की भी कोशिश की,
...फिर नया लेकर आने की भी,
पर कई दफ़ा दुकान के सामने से,
खाली हाथ लौट आया ...
हमारा रिश्ता भी,
खेल-खेल में टूट गया था,
तब से टूटा पड़ा हुआ है,
न उसे कभी जोड़ने की कोशिश की,
और न ही नया बनाने की ...


महीनों पहले,
मेरा आसमानी रंग का चश्मा,
खेल-खेल में टूट गया था,
तब से वो टूटा पड़ा हुआ है।

मसरूफ़ियत

इस एक दुनिया में,
सैंकड़ों दुनिया हैं,
सबकी अपनी-अपनी,
और सब मगन हैं,
अपनी-अपनी दुनिया में,
जैसे तू, वैसे मैं भी...

Self Obsessed !

मुझे किसी और अजूबे की ज़रूरत नहीं, आज-कल मैंने खुद ही अपनी नींद उड़ा रक्खी है ...

अनसुनी बातें

मैं बेशक,
लोगों की बातें,
अनसुनी कर देता हूँ,
मगर मुझे,
याद रह जाता है,
कि
कब,
किसने,
क्या,
किस अंदाज़ में कहा था!


Black and White "COLOR"

चित्र
बिखरे  हुए बाल, बढ़ी हुई दाढ़ी, माथे को जकड़े सच्चे-झूठे ख्याल, हर जगह खुद को तलाश करती आँखें, मुश्किलों को पस्त करती तनी हुई मूंछें, बात- बेबात फूट पड़ती खामोश सी हँसी, और होंठों के पीछे अनकहे, अधूरे किस्से...
फिलहाल के लिए तो यही मैं हूँ।



मायने

कभी देखा है,
पन्नो पर बिलबिलाते, उन लफ़्ज़ों को, जो किसी मतलब का होने के लिए, बड़े उम्मीद भरे लहजे में, ताकते रहते हैं इक-दूसरे को, वैसे भी, बेमायने रहना किसी को पसंद नहीं, आओ, हम-तुम भी गढ़ लें अपने-अपने मायने, कब तलक यूँ ही ताकते रहेंगे इक-दूसरे को?

उनींदा

मुझे नींद में ही रहने दो,
गर मैं जाग उठा,
तो बहुत से लोग,
ज़रूर परेशां हो उठेंगे।

ज़हन

अपने ज़हन में कभी, जाले-वाले, धूल-वूल, लगने मत देना, और लग जाए, तो ज़रा, साफ़-सूफ कर लेना, बस एक यही तो, वो महफूज़ जगह है, जहाँ लोग, ताउम्र, सलामत रहते हैं...

मेरी ईद

ईद की शाम भी मेरी नज़र तेरे छत की तरफ है,
अब तलक मेरी ईद का चाँद नज़र आना बाकी है...


गर्ल-फ्रेंड सार

दुनिया में आये हो तो प्रेम होना स्वाभाविक है,
और आज के समय में किसी लड़की से प्रेम होना कोई बड़ी बात नहीं,
क्योंकि आजकल तो लड़कों को लड़के भी पसंद आने लगे हैं,
कारण कुछ भी हो सकता है,
खैर, जिस लड़की से प्रेम हुआ
वो रिश्ते में हो गई तुम्हारी गर्ल फ्रेंड,
जो आज तुम्हारी है,
कल किसी और की थी,
परसों किसी और की होगी,
और अंत में किसी और के गले हमेशा के लिए पड़ जायेगी,
इसलिए तू जिसे भी प्रेम कर, सिर्फ़ प्रेम कर,
दिल न लगा,
उसे घुमा-फिरा, खिला-पिला, खा-पी और खुश रह,
लेकिन व्यर्थ में हमेशा उसी से खुश रहने की कोशिश मत कर,
वो हमेशा तेरे पास रहने वाली नही है,
क्योंकि न वो टिक पाएगी,
और न तू उसको टिकने देगा,
किंतु गर्ल फ्रेंड नाम का रिश्ता अजर-अमर है,
इस रिश्ते की मृत्यु नही हो सकती,
तुम्हारी गर्ल फ्रेंड तुम्हे छोड़ कर गई, अच्छा हुआ...
आज अकेले हो, कोई बात नही...तुम्हारे लिए अच्छा है,
कुछ दिन का ब्रेक मिला है, खुदको आराम दो,
अब तुम सिंगल हो,
दूसरों के रिश्ते के लिए भय हो,
फिर भी,
तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो,
जो किसी की नही हो सकी वो तुम्हारी क्या होगी?
जिससे तुम मिले यहीं पर मिले,
जिससे मिल…

सर्वाइकल स्पोंडलाइटिस पेन

गर्दन पे कुछ पुराने मर्ज़ के अहसास लौट आये हैं,
शायद उन्हें तलाश तेरी नर्म गोद की है,
पता नहीं और कितने दिनों तक इनका डेरा जमा रहेगा!

गुलज़ार

मैंने सुनी है उनकी, कम्बल जैसी भारी आवाज़, जिसे ओढ़ भी लो, बिछा भी लो.. तस्वीरों में देखा है, उनका बदलता हुआ चेहरा, और चश्में का फ्रेम भी, जिसमें दोनों आँखें, पहले साफ़ दिखाई देती थी, पर अब बढ़ती उम्र की जड़ों ने, उन्हें बाजू और ऊपर से, अन्दर धकेल दिया है, कभी न पिघलने वाली, बर्फ़ जैसी सफ़ेदी भी, दाढ़ी, मूँछ और बालों पर जम गयी है ये शख्स, जिसे दुनिया  "गुलज़ार" के नाम से जानती हैं, वो अब 78 बरस का हो गया है, लेकिन उनकी नज़्में, अब भी जैसी की तैसी हैं, जैसे बरसों पहले थीं, अब भी जवाँ दिल,  गुलज़ार की नज़्में सुनकर, और जवाँ हो जाते हैं..
"जन्मदिन की शुभकामनायें गुलज़ार साहब"


आज़ादी सरहदों से

सियासतदारों ने लोगों के गुस्से को हथियार बना रक्खा है, पैंसठ साल होने को हैं और दिल में घाव जगा रक्खा है, उस वक़्त बाँट दिया था मुल्क को सरहदों से, और आज गलतफहमियों का बाज़ार मचा रक्खा है,
इंसान तो अब भी इंसानियत की हिमायत करते हैं, शफ़क़त* मुखोटों में हैवानों ने कोहराम मचा रक्खा है, और अगर पत्थर तुम भी फेंकोगे किसी के घर में, तो उसने भी जवाब देने का इंतजाम कर रक्खा है,
किसी ने तो घोला है अफवाहों को बयार** में, ज़र्रे-ज़र्रे के माहौल को ज़हरीला बना रक्खा है, और घर के मसले कम हैं सुलझाने के लिए, जो बाहर का इक मसला और उलझा रक्खा है...
यूँ तो ज़मीन पे खींच रखीं हैं लकीरें बेइन्तहां, उससे भी कहीं ज्यादा दिलों को बाँट रक्खा है, हमारी-तुम्हारी आमद को मिले न मिले आज़ादी सरहदों से, लेकिन ख्वाबों में बेहिचक आने-जाने का दस्तूर बना रक्खा है...
और क्यूँ मुश्किल हैं जीना मोहब्बत के सहारे, दुश्मनी और जंग को रिवाज़ बना रक्खा है, हम और वो तो अब भी चाहते हैं एक-दूजे को, पर कमबख्त "उन्होंनें"# ही फासला बना रक्खा है,




* इंसानी  ** हवा  # वो लोग जो ऊँचे ओहदों पर हैं और आम आदमी की पहुँच से बाहर है…

हाथ का मैल

आज तुम्हारे पास है तो तुम इतरा लो,
कल मेरे पास होगा तो मैं इतरा लूंगा,
पर याद रखना ऐ दोस्त!
ये पैसा किसी का सगा नहीं होता...

दौर

चंद दिनों में ही मुझे, मुझसे महरूम कर गए,
ये कौन लोग थे !!! कहाँ से आये थे ???

कैफ़ीन

कॉफ़ी से याद आता है,
जेब को हाथों से टटोलना,
और पूछना,
कि कॉफ़ी फायनेंस कौन करेगा?
कॉफ़ी से याद आता है,
उसे गले तक ले जाने की जल्दी में,
अपनी ज़बान जला बैठना,
फिर उसके फैन को भी,
फूँक-फूंककर पीना,
कॉफ़ी से याद आता है,
डबल मीनिंग बात पर, 
ठहाके मारकर हँसना,
फिर अपने-अपने मतलब तराशना,
कॉफ़ी से याद आता है,
अगली बार मिलने के लिए,
इस बार हाथ मिलाकर जाना,
और अपने-अपने रास्ते चल पड़ना,
कॉफ़ी से याद आता है,
अपना शहर...
और कोई ऐसा,
जिसे कह सकूँ मैं अपना!


बारिश की ख्वाहिश

आसमान के आँगन में,
बादल बैठक तो जमाते हैं,
उनके कहकहों में,
कुछ बूँदें छिटककर,
नीचे भी आती हैं,
और ज़मीदोज़ हो जाती हैं,
महीनों से प्यासी धरती को,
इंतज़ार है,
कि कब,
बादल ठहाके मारकर हँसें,
और बूंदों की झड़ी लग जाए,
बारिश की ख्वाहिश में,
आधा सावन सूखा बीत गया,
और आधा,
बीतने को बाकी है...

भैय्याजी का जन्मदिन

कुछ सालों पहले तक,
आज का दिन,
इतना खाली नहीं होता था,
आज की तारीख लगते ही,
घर का फ़ोन घनघना उठता था,
बधाईयों के कॉल वेटिंग में होते थे,
सुबह,
बाकी दिनों से ज्यादा खुशनुमा होती थी,
स्कूल से आधी छुट्टी से आ जाया करता था मैं,
और फिर,
लग जाते थे हम,
अपने घरों को सजाने में,
क्योंकि,
शाम को,
भैय्याजी का जन्मदिन मानाया जाता था,
उनके और मेरे दोस्तों के साथ,
मोहल्ले के बच्चों को भी बुलाते थे,
जन्मदिन पर,
लेकिन ऐसा,
कुछ सालों पहले होता था,
अब वो नहीं हैं,
सिर्फ,
तारीखें बाकी हैं,
उनके इस दुनिया में आने की,
और
इस दुनिया से जाने की,
आज मैंने माँ-पापा को फोन नहीं किया,
उन्हें लगता होगा कि मैं आज की तारीख भूल गया,
और मुझे लगता है की उन्हें आज का दिन याद नहीं दिलाना चाहिये...

ज़िंदादिली

नाज़ है मुझे अपनी ज़िंदादिली पर,कि किसी बात को कहने के लिये,
मुझे उसपे, कोई चोगा नहीं डालना पड़ता, चाहे तपती धूप हो, जमाने वाली सर्दी हो, या बहा ले जाने वाली बारिश, मेरे अलफ़ाज़, यूँ ही, खुले बदन निकल पड़ते हैं, कहीं भी जाने को, नाज़ है मुझे अपनी ज़िंदादिली पर...

तेरा इंतज़ार

तेरे इंतज़ार में पूरी शाम काटी है मैंने कुछ यूँ,
जैसे अगली साँस के इंतज़ार में दिल की अगली धड़कन,
जैसे ऊपर की पलकों से मिलने को बेताब निचली पलक,
जैसे स्कूल से छूटकर माँ से मिलने को बेताब बचपन,
काश, कि तुम भी कुछ इस तरह ही बेचैन होते,
काश, कि तुम जो कुछ भी होते,
मेरे लिए होते..



अधूरा ख़्वाब

अधूरी नींद है, अल-सुबह किसी ख़्वाब ने जगा दिया,
जो खुद भी अधूरा ही रह गया,
वैसे हर ख़्वाब अगर पूरा होने लगे,
तो हक़ीक़त और उनमें, क्या फर्क रहेगा???

चाय बार

दुनिया इधर की उधर हो जाये लेकिन,
तुम जान-ए-मन,
जैसी की तैसी मिलती हो,
चाय बार में,
काँच के प्याले में..
और एक-दो चुस्कियों में,
जुबां को मीठा कर जाती हो,
वैसे बहुत कड़वाहट भर दी है,
इस दुनिया ने मेरे दिल में,
क्या दिल के लिए भी,
कोई चाय आती है?

चाय और तुम

चाय की प्याली की तपती सतह,
उससे उठती गर्म सी भाप,
होठों से लगते ही,
जुबां को मीठा करने की उसकी अदा,
और,
गले को अंदर से छूती,
उसकी तासीर,
ये चाय मुझे अक्सर,
तुम्हारी याद दिला जाती है...

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टिफ़िन

रात के, लगभग सवा एक बजे,
नींद टूटी,
और
टेबल पर रखे,
टिफ़िन पर,
जा गिर पड़ी,
दफ्तर से लौटकर,
मैंने खुदको,
रख दिया था,
बिस्तर पर,
और टिफ़िन को,
टेबल पर,
बेशक!
वो टिफ़िन,
भरा हुआ था,
भूख भी,
माथे पर,
भिनभिना रही थी,
लेकिन,
पेट तक,
पहुँच न सकी,
इस दौरान,
आँख भी लग गयी,
पौ फटते ही,
भूख से तिलमिलाकर,
मैं जाग उठा,
और टिफ़िन पर,
टूट पड़ा,
पर! ये क्या?
इसके चारों डिब्बे,
पत्त्थर के टुकड़ों से,
भरे पड़े हैं,
लगता है,
होस्टल के,
किसी लड़के ने,
अपनी भूख,
इस पर साफ़ कर दी,
चलो, कोई बात नहीं..
मेरे बारे में कुछ तो सोचा,
पत्थर ही सही,
मेरे खाने के लिये,
कुछ तो छोड़ा इसमें...