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कैफ़ीन

कॉफ़ी से याद आता है,
जेब को हाथों से टटोलना,
और पूछना,
कि कॉफ़ी फायनेंस कौन करेगा?
कॉफ़ी से याद आता है,
उसे गले तक ले जाने की जल्दी में,
अपनी ज़बान जला बैठना,
फिर उसके फैन को भी,
फूँक-फूंककर पीना,
कॉफ़ी से याद आता है,
डबल मीनिंग बात पर, 
ठहाके मारकर हँसना,
फिर अपने-अपने मतलब तराशना,
कॉफ़ी से याद आता है,
अगली बार मिलने के लिए,
इस बार हाथ मिलाकर जाना,
और अपने-अपने रास्ते चल पड़ना,
कॉफ़ी से याद आता है,
अपना शहर...
और कोई ऐसा,
जिसे कह सकूँ मैं अपना!


बारिश की ख्वाहिश

आसमान के आँगन में,
बादल बैठक तो जमाते हैं,
उनके कहकहों में,
कुछ बूँदें छिटककर,
नीचे भी आती हैं,
और ज़मीदोज़ हो जाती हैं,
महीनों से प्यासी धरती को,
इंतज़ार है,
कि कब,
बादल ठहाके मारकर हँसें,
और बूंदों की झड़ी लग जाए,
बारिश की ख्वाहिश में,
आधा सावन सूखा बीत गया,
और आधा,
बीतने को बाकी है...