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ज़हन

अपने ज़हन में कभी, जाले-वाले, धूल-वूल, लगने मत देना, और लग जाए, तो ज़रा, साफ़-सूफ कर लेना, बस एक यही तो, वो महफूज़ जगह है, जहाँ लोग, ताउम्र, सलामत रहते हैं...

मेरी ईद

ईद की शाम भी मेरी नज़र तेरे छत की तरफ है,
अब तलक मेरी ईद का चाँद नज़र आना बाकी है...


गर्ल-फ्रेंड सार

दुनिया में आये हो तो प्रेम होना स्वाभाविक है,
और आज के समय में किसी लड़की से प्रेम होना कोई बड़ी बात नहीं,
क्योंकि आजकल तो लड़कों को लड़के भी पसंद आने लगे हैं,
कारण कुछ भी हो सकता है,
खैर, जिस लड़की से प्रेम हुआ
वो रिश्ते में हो गई तुम्हारी गर्ल फ्रेंड,
जो आज तुम्हारी है,
कल किसी और की थी,
परसों किसी और की होगी,
और अंत में किसी और के गले हमेशा के लिए पड़ जायेगी,
इसलिए तू जिसे भी प्रेम कर, सिर्फ़ प्रेम कर,
दिल न लगा,
उसे घुमा-फिरा, खिला-पिला, खा-पी और खुश रह,
लेकिन व्यर्थ में हमेशा उसी से खुश रहने की कोशिश मत कर,
वो हमेशा तेरे पास रहने वाली नही है,
क्योंकि न वो टिक पाएगी,
और न तू उसको टिकने देगा,
किंतु गर्ल फ्रेंड नाम का रिश्ता अजर-अमर है,
इस रिश्ते की मृत्यु नही हो सकती,
तुम्हारी गर्ल फ्रेंड तुम्हे छोड़ कर गई, अच्छा हुआ...
आज अकेले हो, कोई बात नही...तुम्हारे लिए अच्छा है,
कुछ दिन का ब्रेक मिला है, खुदको आराम दो,
अब तुम सिंगल हो,
दूसरों के रिश्ते के लिए भय हो,
फिर भी,
तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो,
जो किसी की नही हो सकी वो तुम्हारी क्या होगी?
जिससे तुम मिले यहीं पर मिले,
जिससे मिल…

सर्वाइकल स्पोंडलाइटिस पेन

गर्दन पे कुछ पुराने मर्ज़ के अहसास लौट आये हैं,
शायद उन्हें तलाश तेरी नर्म गोद की है,
पता नहीं और कितने दिनों तक इनका डेरा जमा रहेगा!

गुलज़ार

मैंने सुनी है उनकी, कम्बल जैसी भारी आवाज़, जिसे ओढ़ भी लो, बिछा भी लो.. तस्वीरों में देखा है, उनका बदलता हुआ चेहरा, और चश्में का फ्रेम भी, जिसमें दोनों आँखें, पहले साफ़ दिखाई देती थी, पर अब बढ़ती उम्र की जड़ों ने, उन्हें बाजू और ऊपर से, अन्दर धकेल दिया है, कभी न पिघलने वाली, बर्फ़ जैसी सफ़ेदी भी, दाढ़ी, मूँछ और बालों पर जम गयी है ये शख्स, जिसे दुनिया  "गुलज़ार" के नाम से जानती हैं, वो अब 78 बरस का हो गया है, लेकिन उनकी नज़्में, अब भी जैसी की तैसी हैं, जैसे बरसों पहले थीं, अब भी जवाँ दिल,  गुलज़ार की नज़्में सुनकर, और जवाँ हो जाते हैं..
"जन्मदिन की शुभकामनायें गुलज़ार साहब"


आज़ादी सरहदों से

सियासतदारों ने लोगों के गुस्से को हथियार बना रक्खा है, पैंसठ साल होने को हैं और दिल में घाव जगा रक्खा है, उस वक़्त बाँट दिया था मुल्क को सरहदों से, और आज गलतफहमियों का बाज़ार मचा रक्खा है,
इंसान तो अब भी इंसानियत की हिमायत करते हैं, शफ़क़त* मुखोटों में हैवानों ने कोहराम मचा रक्खा है, और अगर पत्थर तुम भी फेंकोगे किसी के घर में, तो उसने भी जवाब देने का इंतजाम कर रक्खा है,
किसी ने तो घोला है अफवाहों को बयार** में, ज़र्रे-ज़र्रे के माहौल को ज़हरीला बना रक्खा है, और घर के मसले कम हैं सुलझाने के लिए, जो बाहर का इक मसला और उलझा रक्खा है...
यूँ तो ज़मीन पे खींच रखीं हैं लकीरें बेइन्तहां, उससे भी कहीं ज्यादा दिलों को बाँट रक्खा है, हमारी-तुम्हारी आमद को मिले न मिले आज़ादी सरहदों से, लेकिन ख्वाबों में बेहिचक आने-जाने का दस्तूर बना रक्खा है...
और क्यूँ मुश्किल हैं जीना मोहब्बत के सहारे, दुश्मनी और जंग को रिवाज़ बना रक्खा है, हम और वो तो अब भी चाहते हैं एक-दूजे को, पर कमबख्त "उन्होंनें"# ही फासला बना रक्खा है,




* इंसानी  ** हवा  # वो लोग जो ऊँचे ओहदों पर हैं और आम आदमी की पहुँच से बाहर है…

हाथ का मैल

आज तुम्हारे पास है तो तुम इतरा लो,
कल मेरे पास होगा तो मैं इतरा लूंगा,
पर याद रखना ऐ दोस्त!
ये पैसा किसी का सगा नहीं होता...

दौर

चंद दिनों में ही मुझे, मुझसे महरूम कर गए,
ये कौन लोग थे !!! कहाँ से आये थे ???