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मायने

कभी देखा है,
पन्नो पर बिलबिलाते, उन लफ़्ज़ों को, जो किसी मतलब का होने के लिए, बड़े उम्मीद भरे लहजे में, ताकते रहते हैं इक-दूसरे को, वैसे भी, बेमायने रहना किसी को पसंद नहीं, आओ, हम-तुम भी गढ़ लें अपने-अपने मायने, कब तलक यूँ ही ताकते रहेंगे इक-दूसरे को?

उनींदा

मुझे नींद में ही रहने दो,
गर मैं जाग उठा,
तो बहुत से लोग,
ज़रूर परेशां हो उठेंगे।