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यादों का डोज़

मैं चार दिन उसके घर में ही ठहरा था, इस दौरान उससे बात कुछ भी नहीं हुई, और होती भी कैसे? जिसके घर में आधा सैंकड़ा मेहमान हों, वहां बात हो भी तो क्या? यूँ कभी आते-जाते टकरा जाएँ तो, देख लेते थे एक-दूसरे को उस पल में इतना, कि पूरा पड़ जाता था बाकी दिन के लिए, फिर वो वक़्त आया, जब उसे सज-संवरके बैठना था मंडप में, बस, उससे कुछ वक़्त पहले, वो आयी थी मेरे कमरे में, बात कुछ भी नहीं की, मुझे देखा और दो आंसू बह निकले उसके, जो साथ में थोड़ा काजल बहाकर ले गए थे, लाली से लदे होंठों तक, आख़िरी बार इतना ही देखा था उसे, तब से रोज़ थोड़ा-थोड़ा करके पुराता* हूँ उसकी यादों को...

*(कुछ कमी होने पर भी, इस तरह से उपयोग करना कि उतने में ही पर्याप्त हो जाए)

मील का पत्थर

तुम्हें जब देखता हूँ,
तो लगता है ये शहर,
नगर और महानगर के बीच,
कहीं अटक गया है!

लोग अपने-अपने घरों से,
निकल तो गए हैं,
लेकिन रुके पड़े हैं कहीं,
शहर के रस्ते में,

छोटे-छोटे कपड़ें पहनें,
बौनी-बैनी सोच लिए,
क्या ये शहरी दिखने वाले लोग,
पहुँच पायेंगे बड़े शहर?
और पहुँच भी गए तो,
क्या वाकई में बड़े बन पायेंगे?


तुम्हें जब देखता हूँ,
तो लगता है ये शहर,
नगर और महानगर के बीच,
कहीं अटक गया है!


आपबीती

महीनों पहले,
मेरा आसमानी रंग का चश्मा,
खेल-खेल में टूट गया था,
तब से वो टूटा पड़ा हुआ है,
मेज़ की बीच वाली दराज़ में,
उसे जोड़ने की भी कोशिश की,
...फिर नया लेकर आने की भी,
पर कई दफ़ा दुकान के सामने से,
खाली हाथ लौट आया ...
हमारा रिश्ता भी,
खेल-खेल में टूट गया था,
तब से टूटा पड़ा हुआ है,
न उसे कभी जोड़ने की कोशिश की,
और न ही नया बनाने की ...


महीनों पहले,
मेरा आसमानी रंग का चश्मा,
खेल-खेल में टूट गया था,
तब से वो टूटा पड़ा हुआ है।

मसरूफ़ियत

इस एक दुनिया में,
सैंकड़ों दुनिया हैं,
सबकी अपनी-अपनी,
और सब मगन हैं,
अपनी-अपनी दुनिया में,
जैसे तू, वैसे मैं भी...