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ये वक़्त है वक़्त बदलने का

ये वक़्त है वक़्त बदलने का,
घने अंधियारे के ढलने का,
जो कैद है सोच ख़यालों में,
उसे हक़ीक़त में बदलने का,
ये वक़्त है वक़्त बदलने का...

जिस झूठ का सम्मान हुआ,
अब जूते से उसे कुचलने का,
दीन-हीन और निर्बल को,
साहस और बल देने का,
ये वक़्त है वक़्त बदलने का...

तिल-तिल करके रोज़ मरे,
अब जीते जी नहीं मरने का,
जो जिसका हक़ वो उसे मिले,
इस हक़ से अब चलने का,
ये वक़्त है वक़्त बदलने का...

आन्दोलन, व्यक्तिगत हित और सामाजिक सरोकार

चित्र
आन्दोलन और मेरा नाता शायद स्कूल का है. जब मैं १२वीं कक्षा में था. तब फेयरवेल पार्टी के आयोजन को लेकर मैं छात्रों की बात सम्बंधित शिक्षक के सामने रख रहा था. वे किसी बात पर सहमत नहीं हो रहे थे और झुंझलाकर उन्होंने मुझे नेता कहकर स्कूल के ही एक बिगड़े लड़के से मेरी तुलना कर दी. ये हिदायत भी दी कि अगर मैं पढ़ाई-लिखाई छोड़कर ऐसे पेश आया तो मेरे हाल उस लड़के के जैसे ही होंगे. मैंने इस बात का विरोध किया और आँखों में आँसू लिए उसी वक़्त स्कूल से बाहर आ गया और चौराहे पर एक पुलिया के ऊपर आकर बैठ गया. थोड़ी देर में मेरी कक्षा और अन्य कक्षा के बाक़ी छात्र भी स्कूल से बाहर आकर मेरे आजू-बाजू खड़े हो गए. उन सबको देखकर मैं चुप हो गया. स्कूल के सचिव ने मुझे सूचना भिजवाकर अपने पास बुलाया. मैंने अपनी समस्या यह रख दी कि मुझे नेता कहा गया. उन्होंने कहा कि इसमें ग़लत क्या है? महात्मा गांधी नेता थे, शहीद भगत सिंह ने भी एक तरह से नेतृत्व ही किया था. हम तुम्हें नेता कहते हैं. क्या तुम अब भी नाराज़ हो जाओगे? मैंने उत्तर में कहा कि अगर आपने मेरी तुलना किसी अन्य बिगड़े छात्र से की तो बेशक़ नाराज़ हो जाऊँगा जैसा कि मेरे शिक्षक …

बदलाव

सूरत बदलने से तरबीयत नहीं बदलती,
तस्वीरें बदलने से सीरत नहीं बदलती,
कोई लाख कोशिश करके भले ही  बदल जाए,
पर दिल की हसरतों की नीयत नहीं बदलती।

2nd Love - A silent love story

दो मुँह वाले

कुछ लोगों का मुंह बहुत चलता है,
अक्सर तब जब दूसरों पर चलाना हो,
फिर चुप भी हो जाते हैं,
जब सारे मुँह उन पर चलते हैं,
इन्हीं लोगों से कहते सुना है कि,
ऊपर जाओगे तो क्या मुँह दिखाओगे,
ये भी कोई कहने वाले बात है,
भई, जो अभी है वही मुँह दिखायेंगे,
मरने के बाद का पता नहीं,
अगर कोई नया मुँह मिल जाये तो,
पर कोई ये भी बताए,
कि उपरवाला किस मुँह से हमसे सवाल करेगा,
उस मुँह से,
जो उसका इस दुनिया की तरफ है,
या फिर उसका भी कोई दूसरा मुँह है???

इंदौर डायरी

पिछले एक महीने में बदलें हैं तो धूप के तेवर.
सड़क पर गाड़ियों और गड्ढों की तादाद, मल्टीप्लेक्स में मूवीज़, इलेक्ट्रिसिटी के रेट्स और पेट्रोल के दाम, कुछ दफ्तरों की शक्लें और मुलाज़िम भी, नहीं बदलें हैं तो बस आप, तुम और तू...

मन

पौधे जैसा ही है ये कि कहीं लगा भी दो,
तो तब तक नहीं लगता, जब तक इसे खुशहाल मिट्टी,  वाजिब नमी और ज़रूरतमंद रोशनी न मिले, गर कहीं लग गया, तो फिर इसे हटाना भी मुश्किल है, कई बार, ज़ोर-ज़बर्दस्ती से हटा भी दो, तो इसका दुबारा पनपना, मुश्किल होता है, वैसे,
दुनिया में अनगिनत लोग, बेमन तरीके से लगे हैं, अपने - अपने कामों में, क्योंकि कभी - कभी, रोज़ी - रोटी के लिए, मन मार के भी काम करना पड़ता है, चलता हूँ...
मेरा भी कुछ काम बाकी पड़ा है.

हैप्पी न्यू इयर २०१३

मन तो करता है कि,
अपने अल्फ़ाज़ों को,
शहद में भिगोकर,
उस पर मिश्री के दाने छिड़ककर,
कागज़ पर लिख दूं,
साल २०१३ की आप सबको शुभकामनायें,
फिर लगता है कि,
ज़्यादा मीठा चखने से,
काग़ज़ के दांत खराब हो गए,
तो इसकी ज़िम्मेदारी आप लेंगे???
इसलिए,
सादी शुभकामनायें लिख रहा हूँ,
२०१३ के लिए...