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बातचीत - In a conversation with friends - 3

वो आख़िरी ही ख़त था उसका
जिसमें पहली मुलाक़ात का ज़िक्र था
ज़िक्र क्या था...ब्यौरा सा ही दिया था उसने
कि किस तरह वो मुझपे लट्टू हुई थी
फिर कैसे गश्त से उसको आये थे
कि कॉफ़ी हाउस की टेबल पर पहली दफ़ा
उसके हाथ कंपकपाये थे
छुरी-काँटा तो छुआ भी न था उसने उस दिन
कटलेट हाथ से ही खाया था
वो बड़ा अजीब था उसके लिए...
वैसे उस दिन ज़्यादातर जो कुछ हुआ
अजीब ही था
क्योंकि वादा चाय पे मिलने का था
और उसने ऑर्डर कोल्डड्रिंक किया था
जैसे कोल्डड्रिंक की उस बोतल के
कार्बोनेटेड वॉटर में
C O 2 के बुलबुले पैदा हो रहे थे 
मुझे देखकर उसे भी
घबराहट और मोहब्बत की
मिक्स फ़ीलिंग आ रही थी
वो लम्हा उसके लिए बेहद मुश्किल सा था
जब न मैंने कुछ कहा
न वो कुछ कह पायी थी
बिल देने की भी उसे
बहुत जल्दी थी
अपने आख़िरी ख़त में
इस वाक़िये का ज़िक्र करते हुए
इक शे'र भी लिखा था उसने
अफ़सोस वो शे'र मुझे याद नहीं है,
क्योंकि वो आख़िरी ख़त मेरे पास नहीं है
उसके जाने के बाद
एक-एक करके मैंने जो खोया
उसमें वो आख़िरी ख़त भी था उसका
जिसमें पहली मुलाक़ात का ज़िक्र था
ज़िक्र क्या था...ब्यौरा सा ही दिया था उसने.

बेटियाँ

अँधेरे कमरे में भी
धूप को पनपने के लिए
बस इक सुराख़ की ज़रूरत है
जहाँ से छनकर
वो अपना अक्स
ख़ुद ही तराश लेती है
फिर जितनी देर
वो उस अँधेरे कमरे में रहती है
उतनी देर वो हिस्सा
बक़ायदा रोशन रहता है
बेटियाँ जहाँ भी जाती हैं
उनके साथ वहाँ उजाला भी जाता है.

बातचीत - In a conversation with friends - 2

हर इक बात का ग़र सिर्फ़ एक मतलब होता,
तो लोग अपना-अपना मतलब कैसे निकालते ??

बातचीत - In a conversation with friends - 1

इतनी रात गए 
सिर्फ़ अँधेरा ही हाथ लगता है
रूहों से मिलना हो तो
सुबह की अज़ान के वक़्त 
आसमां में देखना
शायद गुम होते सितारों के बीच
कोई इक मिल भी जाए!!


(यही कोई रात के 3 बजे के आस-पास की बात रही होगी फ़ेसबुक चैट पर)

बस एक दिन के लिए... हैप्पी दिवाली!!

चित्र

फेसबुक वॉल

न कोई नज़्म है
न कोई इश्तिहार ही ये दीवार भी मेरे दिल की तरह खाली ही है नज़दीक आकर देखो तो शायद कुछ महीन दरारें दिख भी जाएँ दिल में भी और दीवार में भी...

यादों का डोज़

सब्ज़ीवाले से पाँच रुपये की मसाला मांगो तो वो धनिया, मिर्ची, कढ़ी पत्ता और अदरक देता है काग़ज़ में बाँध के वैसे ही मैंने इन्हें बाँध दिया है मसाला खाने का स्वाद बढ़ाता है और ये अहसास में इज़ाफा कर देती हैं इस तरह की यादें और भी हैं लेकिन फ़िलहाल के लिए
इतना डोज़ काफ़ी है...

यादों का डोज़ एल्बम के बारे में

टूटती हुई चीज़ें

इस दुनिया से भी बड़े-बड़े वादों को
टूटते देखा है मैंने
वो जब टूटते हैं
तो उससे ज़रा पहले
हल्की रोशनी देते हैं
और फिर बुझ जाते हैं सदा के लिए
किसी टूटते तारे की तरह...

इस दुनिया से भी बड़े-बड़े वादों को
टूटते देखा है मैंने...

हाथों की लकीरें

रात भर सुलगता रहा
जलता भी रहा न चिंगारी थी न आग न धुआँ वहां सुबह ठण्डी राख़ का इक ढेर मिला जिसे हवा ने ज़्यादा देर जीने नहीं दिया वो भी उसे तितर-बितर करते हुए आगे बढ़ गयी मुझे याद है वो स्याह रात बेहद सर्द थी जिसकी तपिश से हथेलियाँ जल गयीं थीं उनमें कुछ लकीरनुमां निशान पड़ गए थे कुछ लोग कहते हैं कि इन लकीरों से इन्सान का आने वाला कल होकर गुज़रता है पर मैं तो अब भी इनमें बीता हुआ कल ही ढूंढ रहा हूँ इस उम्मीद में कि शायद तुम भी वहीँ-कहीं मिलोगे लेकिन अब तक कुछ हाथ नहीं आया बस हाथ में हैं तो वो ही आड़ी-टेढ़ी लकीरें...

मैंने तुमसे कह तो दिया

मैंने तुमसे कह तो दिया कि तुम पर मैंने कुछ लिखा है...
और तुम भी खामाख्वाह में जज़्बाती होकर
पूछने लगीं कि लिखा क्या है?
हालाँकि, वो मैंने तुम्हें यूँ ही नहीं कहा था
क्योंकि मैंने कल रात तुम्हें आईने में रखकर
लफ़्ज़ों को बुना था,
पर आज जब मैं तुमसे दुबारा मिला
तो लगाकि कुछ कमी रह गयी थी उनमें
इसलिए अभी उन लफ़्ज़ों की सिलाई उधेड़कर
दुबारा कुछ बुनने बैठा हूँ
और अब सोच रहा हूँ
किशुरू कहाँ से करूँ?
तुम्हारा मुझे पुकारने के अंदाज़ से?
जिसमें मैं साउथ का कोई हीरो होता हूँ..
या फिर चाय पीने की उस अदा पे
जब तुम प्याले को बड़े इत्मीनान से होंठो से लगाती हो?
या तुम्हारी आँखों से
जिन्हें तुम कभी-कभी
दोनों तरफ से काजल की कैद में समेट देती हो ???
ह्म्म्म...आज रहने देता हूँ...
फिर कभी फुरसत में बैठूँगा सोचूँगा..
ठीक उसी तरह जैसे
तुम्हें बनाने के लिये खुदा ने भी सोचा होगा,
वक्त निकाला वक्त निकला होगा....
लेकिन
मैंने तुमसे कह तो दिया है कि
तुम पर मैंने कुछ लिखा है...

अधूरा वादा

धूप में कुछ चीज़ें तपते-तपते सख्त हो जाती हैं कुछ नर्म तो कुछ फीकी पड़ जाती हैं, मई के इस महीने में छत पर सूखती कैरी मटमैली पड़ गयी हैं अब ये साल भर तरी में खट्टापन देती रहेंगी वैसे जून का एक अधूरा वादा भी पिछले साल से पड़ा-पड़ा तप रहा है, हमारे रिश्ते में ये अधूरा वादा कुछ खटास लेकर ज़रूर आयेगा चलो अच्छा है! बरसों के बेमज़ा इस रिश्ते में कोई स्वाद तो आयेगा...

बरसों पुराना रिश्ता

उन दोनों के बीच
प्यार का रिश्ता,
आज भी इतना ताज़ा है
कि,
इक-दूजे का हाथ
ग़लती से भी
इक-दूजे को छू जाए तो
ग़लती का अहसास हो जाता है
कि,
इक-दूजे का हाथ
पकड़ने से पहले
अब भी
इक-दूजे से
पूछ लिया जाता है,
उन दोनों के बीच
बरसों पुराना ये रिश्ता
अब भी इतना ताज़ा है
जिसके सामने ओस की बातें भी फीकी
और कली-कोपलों की मिसालें भी छोटी हैं,
उन दोनों में "वो" कहती है कि
"एक अच्छे रिश्ते की यही पहचान है"

उन दोनों के बीच
प्यार का रिश्ता,
आज भी इतना ताज़ा है...

जैसे को तैसा

ज़िंदगी जब तुम्हारे मज़े लेने लगे,
तो शिक़ायत मत किया करो,
अमां यार, जब तुमने उसके लिये थे मज़े,
तब उसने कुछ कहा था क्या ???

मीडियावाला

बेबसी और मजबूरियों की तस्वीरें छापकर,

उसने अपना बँगला तान लिया लोगों के घर उजाड़कर...

ज़ाया होती रातें

क्लास वर्क भी बहुत रहता है,
और होमवर्क भी कुछ ज़्यादा ही मिलता है,
ज़िन्दगी के इक सबक पर आकर अटक सा गया हूँ,
मसरुफ़ियत इस कदर हो चली है,
कि तारीख़ भी ठीक-ठीक समझ नहीं आती हैं,
कभी अगली तारीख़ पे पहुँच जाता हूँ,
तो कभी पिछली से निकल ही नहीं पाता,
इन तारीख़ों में कई रातें बीत गयीं,
जब न कोई नज़्म ही लिखी,
न तुझे ही ठीक से याद कर पाया,
रातें यूँ ही ज़ाया हो रही हैं,
और कब तक होती रहेंगी,
कुछ कह नहीं सकता...

वॉइस मेसेज

अपने ख़त की तरह
कभी अपनी आवाज़ भी
लिफ़ाफ़े में रखके भेजो!
मुझे लगता है
कि लिखावट की तरह
तुम्हारी आवाज़ भी
बेहद ख़ूबसूरत होगी
जिसमें तमाम नुक़ते
तारों जैसे हसीन लगते होंगे...

खैर-ख़बर पूछने वाले लोग

ख़ुदा ने आपके जैसे भी लोग बनाये हैं,
थोड़े बनायें हैं पर क्या ख़ूब बनायें हैं.

खैर-ख़बर

कितने लोग हैं ज़िन्दगी में,
पर खैर-ख़बर तुम ही पूछते हो,
पता नहीं
वाकई पूछते हो
या यूँ ही पूछते हो!!

इंतज़ार

बड़ी देर से बैठा है सूरज तेरी बालकनी में टकटकी लगाए,
कि कब तू नींद से जागे और आँखें मलते हुए धूप से टकरा जाए..

बहरूपिया

तेरी इक झलक पाने को छत से खिड़की तक आता है,
ये सूरज है जो कभी-कभी चाँद की शक्ल में आता है...

उसका आई लव यू

कुछ लफ्ज़ वो ऐसे कहती है,
कोई जादू जैसे  फूँकता हो,
फिर चेहरे पर हँसी यूँ आती है,
जैसे कहकहा कहीं गूंजा हो...