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टूटती हुई चीज़ें

इस दुनिया से भी बड़े-बड़े वादों को
टूटते देखा है मैंने
वो जब टूटते हैं
तो उससे ज़रा पहले
हल्की रोशनी देते हैं
और फिर बुझ जाते हैं सदा के लिए
किसी टूटते तारे की तरह...

इस दुनिया से भी बड़े-बड़े वादों को
टूटते देखा है मैंने...

हाथों की लकीरें

रात भर सुलगता रहा
जलता भी रहा न चिंगारी थी न आग न धुआँ वहां सुबह ठण्डी राख़ का इक ढेर मिला जिसे हवा ने ज़्यादा देर जीने नहीं दिया वो भी उसे तितर-बितर करते हुए आगे बढ़ गयी मुझे याद है वो स्याह रात बेहद सर्द थी जिसकी तपिश से हथेलियाँ जल गयीं थीं उनमें कुछ लकीरनुमां निशान पड़ गए थे कुछ लोग कहते हैं कि इन लकीरों से इन्सान का आने वाला कल होकर गुज़रता है पर मैं तो अब भी इनमें बीता हुआ कल ही ढूंढ रहा हूँ इस उम्मीद में कि शायद तुम भी वहीँ-कहीं मिलोगे लेकिन अब तक कुछ हाथ नहीं आया बस हाथ में हैं तो वो ही आड़ी-टेढ़ी लकीरें...