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October, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बातचीत - In a conversation with friends - 3

वो आख़िरी ही ख़त था उसका
जिसमें पहली मुलाक़ात का ज़िक्र था
ज़िक्र क्या था...ब्यौरा सा ही दिया था उसने
कि किस तरह वो मुझपे लट्टू हुई थी
फिर कैसे गश्त से उसको आये थे
कि कॉफ़ी हाउस की टेबल पर पहली दफ़ा
उसके हाथ कंपकपाये थे
छुरी-काँटा तो छुआ भी न था उसने उस दिन
कटलेट हाथ से ही खाया था
वो बड़ा अजीब था उसके लिए...
वैसे उस दिन ज़्यादातर जो कुछ हुआ
अजीब ही था
क्योंकि वादा चाय पे मिलने का था
और उसने ऑर्डर कोल्डड्रिंक किया था
जैसे कोल्डड्रिंक की उस बोतल के
कार्बोनेटेड वॉटर में
C O 2 के बुलबुले पैदा हो रहे थे 
मुझे देखकर उसे भी
घबराहट और मोहब्बत की
मिक्स फ़ीलिंग आ रही थी
वो लम्हा उसके लिए बेहद मुश्किल सा था
जब न मैंने कुछ कहा
न वो कुछ कह पायी थी
बिल देने की भी उसे
बहुत जल्दी थी
अपने आख़िरी ख़त में
इस वाक़िये का ज़िक्र करते हुए
इक शे'र भी लिखा था उसने
अफ़सोस वो शे'र मुझे याद नहीं है,
क्योंकि वो आख़िरी ख़त मेरे पास नहीं है
उसके जाने के बाद
एक-एक करके मैंने जो खोया
उसमें वो आख़िरी ख़त भी था उसका
जिसमें पहली मुलाक़ात का ज़िक्र था
ज़िक्र क्या था...ब्यौरा सा ही दिया था उसने.

बेटियाँ

अँधेरे कमरे में भी
धूप को पनपने के लिए
बस इक सुराख़ की ज़रूरत है
जहाँ से छनकर
वो अपना अक्स
ख़ुद ही तराश लेती है
फिर जितनी देर
वो उस अँधेरे कमरे में रहती है
उतनी देर वो हिस्सा
बक़ायदा रोशन रहता है
बेटियाँ जहाँ भी जाती हैं
उनके साथ वहाँ उजाला भी जाता है.

बातचीत - In a conversation with friends - 2

हर इक बात का ग़र सिर्फ़ एक मतलब होता,
तो लोग अपना-अपना मतलब कैसे निकालते ??

बातचीत - In a conversation with friends - 1

इतनी रात गए 
सिर्फ़ अँधेरा ही हाथ लगता है
रूहों से मिलना हो तो
सुबह की अज़ान के वक़्त 
आसमां में देखना
शायद गुम होते सितारों के बीच
कोई इक मिल भी जाए!!


(यही कोई रात के 3 बजे के आस-पास की बात रही होगी फ़ेसबुक चैट पर)

बस एक दिन के लिए... हैप्पी दिवाली!!

चित्र

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न कोई नज़्म है
न कोई इश्तिहार ही ये दीवार भी मेरे दिल की तरह खाली ही है नज़दीक आकर देखो तो शायद कुछ महीन दरारें दिख भी जाएँ दिल में भी और दीवार में भी...