रविवार, 30 अगस्त 2015

तो फिर एक बार में निकल सकता है FTII Entrance Exam

23 अगस्त 2015 को FTII का Film Direction and Screenplay writing (3 year) के लिए Entrace Exam देने के बाद मैं इस बारे में नोट्स बना रहा था कि जो लोग इस परीक्षा में उत्तीर्ण होना चाहते हैं उन्हें क्या करना चाहिए? इस सिलसिले में कुछ महत्तवपूर्ण बिंदु जो मुझे समझ आये हैं मैं उनका ज़िक्र करता हूँ, जहाँ तक मेरी समझ है यदि इन पर अमल किया जाए तो बहुत हद तक पहली कोशिश में आप इस परिक्षा को उत्तीर्ण कर सकते हैं.

लेखन क्षमता और गति – तीन घंटे के पेपर में लिखने के लिए बहुत कुछ होता है लेकिन अभ्यास न होने की वजह से पेपर पूरा न लिख पाना आपको बाद में भारी पड़ सकता है. इसलिए बेहतर है कि परीक्षा के तीन से चार माह पूर्व प्रतिदिन एक पृष्ठ शुद्ध लेख लिखें. आप चाहें तो उस शुद्ध लेख में कोई ऐसी जानकारी लिखें जो आपकी परिक्षा के समय में आपके लिए महत्तवपूर्ण साबित हो.

आज, अभी और इसी समय – आपके विषय से सम्बंधित कोई लेख या जानकारी मिलने पर उसे बाद में पढने के लिए न छोडें. उसे तुरंत पढ़कर सुरक्षित रखने से पहले उसका एक फोटो अपने मोबाइल से ज़रूर ले लें. आपने जो भी पढ़ा है उसके विषय में बातों ही बातों में किसी से उस जानकारी का ज़िक्र करें. यदि कोई महत्त्वपूर्ण जानकारी उसमें छूट रही है तो उसे तुरंत मोबाइल द्वारा लिए हुए फोटो में देख लें.

भारतीय लोककलाओं से सम्बंधित फ़िल्म – जिस समय भारतीय सिनेमा आकार ले रहा था उसके अलावा वो अन्य फ़िल्म्स् जिनमें भारतीय लोक कलाओं का थोड़ा भी चित्रण किया गया हो अथवा जिसकी पटकथा में किसी लोक कला का ज़िक्र हो. ये लोक कला कौन सी है और किस राज्य से इसका सम्बन्ध है उसे अवश्य याद रखें.

भारतीय पुरूस्कार – विदेशी पुरुस्कारों की जानकारी ज़रूर रखिये लेकिन फ़िल्म और साहित्य से जुड़े हुए भारतीय पुरुस्कारों की जानकारी अवश्य रखिये. ये जानकारी दो तरह से याद रखिये, पहला कौन सा पुरूस्कार किसे मिला है और दूसरा किसे कौन सा पुरूस्कार मिला है. यानि किसी व्यक्ति का नाम लेते ही उसे मिले महत्त्वपूर्ण पुरूस्कार आपको याद जाएँ और किसी पुरूस्कार का ज़िक्र करते ही उसे पाने वाले लोगों का नाम आपकी ज़ुबान पर हो.

महत्त्वपूर्ण घटनाएँ -  ऐसी कोई भी समसामयिक घटना जिसका प्रभाव सिर्फ़ किसी व्यक्ति या संस्था पर न पड़कर पूरे समाज पर पड़ता हो, उसके बारे में ज़रूर पढ़ें और तथ्यों को याद रखें. जैसे वह घटना कब, कहाँ, किसके साथ, किसके द्वारा हुई थी और ऐसी संस्था में महत्तवपूर्ण पदों पर कौन व्यक्ति थे. ख़ासतौर से मीडिया या फ़िल्म जगत से जुड़ी घटना जो किसी समाचार पत्र, न्यूज़ चैनल, पत्रकार, सम्पादक, प्रोडक्शन हाउस इत्यादि से जुड़ी हो.

तकनीकी शब्द – मीडिया और फ़िल्म जगत से जुड़े वे तकनीकी शब्द जो सुनने में एक ही विधा लगते हों लेकिन उनका समबन्ध किसी और विधा से हो.
मीडिया और फ़िल्मी हस्तियों के कार्य – वे फ़िल्म हस्तियाँ जो सिनेमा के प्रारम्भिक दौर और वर्तमान में अपने काम के लिए जानी जाती थीं अथवा हैं, उनके बारे में ज़रूर पढ़ें. साथ ही वे हस्तियाँ जो समसामयिकी में दिवंगत हुई हों उनके जीवन और कार्य को अवश्य देखें. यही आप विदेशी सिनेमा पर भी लागू करें.
धार्मिक ग्रंथों, पुस्तकों पर आधारित कार्य – भारतीय धार्मिक ग्रंथों, किवदंतियों और पुस्तकों पर बनी भारतीय फ़िल्म्स् के साथ विदेशी भाषा में बनी फ़िल्म्स् की जानकारी अवश्य रखिये.

ऐतिहासिक धर्म स्थल – भारत के अलावा अन्य देशों में स्थित ऐसे धार्मिक स्थल जो भारतीयों के लिए महत्तवपूर्ण हों.

ऐतिहासिक लेखक – वे लेखक जिनकी रचनाओं को मील का पत्थर और शैली को विशिष्ट माना जाता है, उनकी जीवनी पढ़िये और साथ ही उन्हें दिए गए महत्तवपूर्ण पुरूस्कार याद रखिये.

ऐतिहासिक और चर्चित किताब – ऐसी किताबें जो अपनी या लेखक की विशिष्टता के लिए जानी जाती हैं उन्हें पढ़िये साथ ही उनकी संक्षिप्त कहानी और उनके महत्तवपूर्ण पात्रों का नाम ध्यान रखिये.

शास्त्रीय नृत्य और संगीत – इसके अंतर्गत कलाओं के साथ-साथ कलाकारों और उनसे सम्बंधित राज्यों के बारे में जानकारी रखिये.

बहुआयामी नज़रिया – इन्टरनेट पर किसी महत्तवपूर्ण चित्रकार और उसके चित्र को खोजिये. उसके चित्र को देखकर आपके मन में जो भाव उमड़ते हैं उन्हें लिखने का प्रयत्न कीजिये. साथ ही उस चित्र को उस चित्रकार के नज़रिए से अलग से वर्णन कीजिये. इसके बाद उस चित्र की समीक्षा खोजिये और अपने द्वारा किये गए वर्णन से उसका मिलान करके देखिये. अलग चित्र और चित्रकारों की समीक्षा पढ़िए. यही अभ्यास कवि और उनकी कविताओं के साथ कीजिये. ये अभ्यास आपको परिक्षा में दिए जाने वाले विवरणात्मक प्रश्नों के लिए पहले से तैयार कर देगा.

आँख – कान – कल्पना – कहीं पर भी किसी दृश्य को देखते समय, किसी बात को सुनते समय उसमें निहित और उसके आस-पास वाली ध्वनियों को सुनिए. उन्हें अलग-अलग पहचानने की कोशिश कीजिये. किसी कविता या लेख को पढ़ते समय उसमें घट रही घटनाओं को अपनी कल्पना से ध्वनि के साथ देखने की कोशिश कीजिये.

डॉक्यूमेंट्री, इंटरव्यू और फ़िल्म्स् –  भारतीय निर्देशकों द्वारा तैयार की गयी डॉक्यूमेंट्री की जानकारी अवश्य रखिये. कला, संस्कृति और समाज से जुड़ी डॉक्यूमेंट्री यदि उपलब्ध हो जाएँ तो ज़रूर देखिये. साथ ही निर्देशकों के इंटरव्यू भी देखिये और सिनेमा लेकर उनके नज़रिए को समझिये. अपना नज़रिया विकसित करने के लिए हिन्दी और विदेशी सिनेमा देखिये. हर तरह के सिनेमा में कुछ फ़िल्म्स् मुख्य धारा से हटकर होती हैं, उन्हें ज़रूर देखिये. शुरू में आपको ये थोड़ा उबाऊ लगेगा लेकिन बाद में आप इसमें रूचि लेने लगेंगे. यही रूचि आपकी सिनेमा के प्रति आपके नज़रिए को विकसित करने में सहायक होगी.

अंत में - याद रखिये, आप ऐसे संस्थान का हिस्सा बनने के लिए प्रयासरत हैं जहाँ आपकी विधा से जुड़े दस या बारह लोग ही प्रतिवर्ष संस्था चुनती है. ऐसे में वे आपसे क्या अपेक्षा करते हैं ये सोचिये. जहाँ तक मुझे लगता है उन्हें ऐसी प्रतिभा की तलाश होती है जो अपने विषय को लेकर मूल जानकारी के साथ उपलब्ध महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ रखता हो. लेकिन इसके अलावा उसके पास ऐसी जानकारियाँ हों जिसे आम आदमी ने कम महत्त्वपूर्ण समझकर अनदेखा कर दिया हो या देखा ही न हो. इसलिए ज़रूरी है निरंतर जानकारी हासिल करते रहना. कोई भी ऐसी जानकारी जो आपको महत्त्वपूर्ण दिखती है उसके पीछे किस तरह से कला या संस्कृति से जुड़ा प्रश्न हो सकता है ये आपको खोजना है. यदि पूरे साल आप इस परीक्षा के लिए तैयारी करते हैं तो ये क्या आप कोई भी परीक्षा उत्तीर्ण कर सकते हैं.

(ऐसे मूल सिद्धान्त जो कभी लिखे नहीं गए हैं लेकिन किसी भी प्रतियोगी परिक्षा की तैयारी में उनका निरंतर पालन होता आ रहा है. जैसे सामान्य ज्ञान, समसामयिक घटनाएँ, राजनीतिक परिदृश्य इत्यादि वो लेख में छोड़ दिए गए हैं, परीक्षा की दृष्टी से आप उन्हें भी ध्यान रखें)

इस लेख से जुड़े विचार आप chakreshsurya@gmail.com पर भेज सकते हैं.  

शनिवार, 15 अगस्त 2015

15 अगस्त, रॉबिन हुड और राम

आज 15 अगस्त को मैं अपने ही गाँव के स्कूल में था, मैंने वहाँ बच्चों से ये नहीं पूछा कि आज के दिन झन्डा क्यूँ फहराते हैं? और न ही उनसे देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति का नाम पूछा। मैंने ऐसा इसलिए नहीं किया क्यूँकि बहुत सारे लोग इस तरह के सवाल बच्चों से पूछते हैं और सही जवाब न मिलने पर कहते हैं कि जिन बच्चों को स्वतंत्रता दिवस के मायने नहीं पता वो आगे चलकर हमारे देश का भविष्य कैसे बनेंगे? इसलिए मुझे लगता है कि उन बच्चों पर लानत लादने से पहले हमें अपनी बुज़ुर्ग पीढ़ी से पूछना चाहिए कि हमें इस आज़ादी का क्या मतलब निकालना चाहिए? क्योंकि अगर आप किसी लड़के या लड़की के साथ पार्क में बैठे हैं तो आपसे पहले आपके घर आपकी ख़बर पहुँच जायेगी फिर परिवार वाले आपकी ख़बर लेंगे। हमारे देश के ज़्यादातर हिस्सों में आपसे ऐसी "हरकत" करने पर कोई सफ़ाई नहीं माँगी जाती, बस सीधे धुलाई की जाती है। बुजुर्गों के मुताबिक़ एक लड़की और लड़के का सड़क पर हाथ में हाथ डाल कर घूमना-चूमना अश्लील है बजाए किसी को मारने-पीटने, मूत्र विसर्जन करने, तोड़-फोड़ करने और धूम्रपान करने के। वो ये भी चाहते हैं कि स्कूल में पढ़ाई के नाम पर सबकुछ पढ़ाया जाए लेकिन सेक्स एजुकेशन? "वो" ऐसी चीज़ है जो सब अपने आप कहीं न कहीं से पढ़ ही लेंगे। चिन्ता तब बढ़ जाती है जब ऐसे देश में जहाँ (खजुराहो) मंदिर की दीवारों पर "काम" को बेहिचक उकेरा गया है, जिस देश ने दुनिया को "कामसूत्र" दिया है वहाँ गर्भनिरोध और सेनेटरी आइटम्स के विज्ञापन आने पर कभी चैनल तो कभी विषय बदल दिया जाता है। ऐसे ही लोगों के मुताबिक़ समाजसेवी, समाज सुधारक या "नेतागिरी" जैसा कार्य आपका करियर ऑप्शन नहीं हो सकता। इसलिए किसी और के बेटे या बेटी की सरकारी अथवा कॉर्पोरेट नौकरी का ज़िक्र करते हुए रोज़ खाना खाते वक़्त आप पर निशाना साधकर कहा जाता है कि ये महात्मा गाँधी या भगत सिंह बनकर देश को सुधारना चाहते हैं। उन्हें ऐसा लगता है सरकारी नौकरी में जाकर आप दो पैसे कमाकर और चार पैसे दबाकर उनका नाम ज़्यादा रोशन कर सकते हैं। नौकरी का ज़िक्र आते ही आरक्षण का हवाला देकर सामान्य तबके का दर्द बयाँ करने वाले बुज़र्गों को, कभी किसी दलित का अपनी मजदूरी माँगने पर उसे क्रेशर में पीस दिए जाने का दर्द महसूस करते नहीं देखा। और न ही किसी दलित का हुक्का-पानी बंद करने पर भूख हड़ताल करते। बेशक हमारे बुज़ुर्गों ने दलितों का कुछ नहीं बिगाड़ा शायद दूसरे ग्रह के लोग होंगे जो पहले दलितों को पाँव की जूती बनाकर रखते थे और अब बदलते हालातों से कुंठित होकर उन्हें जूती से ठोक देते हैं। इसके बजाये अच्छा होता कि वे ही दलितों के लिए ऐसी स्थिति पैदा कर देते कि दलित स्वयं आरक्षण का विरोध करने लगते जैसा कि विज्ञापन में लोगों को गैस की सब्सिडी छोड़ते दिखाया गया है। आरक्षण नाम की ही एक फ़िल्म आयी थी जिसमें बच्चन साहब कहते हैं "इस देश में दो भारत बसते हैं"। मैं यहाँ किसी को इस सम्वाद के ज़रिये किसी को "डबल स्टैण्डर्ड" नहीं कह रहा। मैं कौन होता हूँ कहने वाला? मैं आपको दूसरे भारत यानि मेरे गाँव के बारे में बताता हूँ। मेरे गाँव के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो ऊपर की गयी माथा-पच्ची से भी कहीं ज़्यादा बड़े सवाल मौजूद हैं। जैसे कि वहाँ किसानों को खेत के लिए समय पर पानी और बीमारों के लिए समय पर इलाज मिल जाए, बच्चों को सरकारी स्कूल में इतनी शिक्षा मिल जाए कि उन्हें सरकारी नौकरी मिल जाए क्योंकि खेती-बाड़ी में सिर्फ गुज़ारा ही हो पाता है। बेरोज़गारी से त्रस्त नौजवान सट्टे में क़िस्मत आज़मा रहा है कि कहीं अगर नम्बर लग गया तो किसान क्रेडिट कार्ड से उठायी रकम उसका पिता न सही, वो वापिस कर देगा। शराब की लत भी अब गाँवों को गाज़र घास की तरह घेरने लगी है। गाँव के ही कुछ लड़के मुझसे पूछने लगे कि भैया, शहर में काम नहीं है
तो मैंने उन्हें "तकनीकी खेती" और "स्वयं सेवी संस्था" का लेक्चर पेल दिया। वो लेक्चर उन्हें कैसा लगा ये तो नहीं पता लेकिन उनके जाते ही मेरे लिए वहाँ एक और बड़ा सवाल तब पैदा हो गया जब मैंने आँगनबाड़ी में जाने वाले बच्चों को साँची के दूध पाउडर वाला "पौष्टिक दूध" पीते देखा और वहीं उनके घर के लोगों को 15 से 20 रुपये लीटर शुद्ध दूध, दूधवालों को बेचते देखा। गाँव के हालात देखकर ग़ालिब का एक शे'र याद आता है-

कोई उम्मीद बर नहीं आती कोई सूरत नज़र नहीं आती
मौत का एक दिन मु'अय्यन है नींद क्यों रात भर नहीं आती।

          कुछ इस तरह की उलझनों और सवालों के साथ में गाँव से शहर लौट आया हूँ लेकिन अभी भी गाँव से पूरी तरह बाहर नहीं आ पाया। ये शायद तभी मुमकिन हो पायेगा जब इस शहर से और बड़े शहर चला जाऊँगा। वो कहते हैं न कि नए माहौल में ढलने में थोड़ा समय लगता है। कुछ बुज़ुर्ग लोग इसे पढ़ने के बाद मुझे सहानुभूति भरे सन्देश भेजकर कहें कि 15 अगस्त और 26 जनवरी को ऐसे सवाल आते हैं और चले जाते हैं इसलिए मुझे ज़्यादा चिंतित नहीं होना चाहिए। फिर भी मुझे राजनीति और सोशल मीडिया के ज़रिये बदलते परिदृश्य को देखकर लगता है कि बहुत जल्द छोटे शहरों और गाँव के हालात बदलने कोई रॉबिन हुड या राम ज़रूर आएगा लेकिन कितनी जल्दी आएगा उसका मुझे अंदाज़ा नहीं है।