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जान-पहचान

मैं खो भी जाऊँ तो मुझे ढूँढ लेगा वो
मुझे मुझसे वो कुछ ज़्यादा जानता है

करेंट अफ़ेयर्स

दिल पर हाथ रखकर बताना ज़रा
ये हज़ार-पाँच सौ का बंद करके
छोटी मछलियाँ तो फँसा लीं तुमने
उन 648 बड़ी मछलियों का क्या
जिनका अकाउंट स्विस में है
जो तुम्हारी पार्टी को डोनेशन देती हैं
जिनका लगभग हर मीडिया हाउस में भारी निवेश है
जिन्होंने महान और सिंगरौली के जंगल उजाड़ दिए हैं
ख़ैर
इसमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है
भारत की जनता शॉर्ट टर्म मेमोरी लॉस से पीड़ित है
उसे कुछ भी ज़्यादा दिन तक याद नहीं रहता
न ही व्यापम में हुए हत्याओं का अर्द्धशतक
न ही छात्रवृत्ति में अरबों का घोटाला
न ही कोई और स्कैम
ये बेचारे जो आँख बंद कर लेते हैं
अपने मोहल्ले की सड़क पर गड्ढे देखकर
ये दूसरे स्टेट्स में होने वाले किसी अन्याय के लिए
ख़ाक आवाज़ उठाएँगे!
पेट्रोल के दाम तुम्हारे राज में भी वैसे ही हैं
जैसे दूसरे के राज में थे
बिजली का भी वही हाल है
ग़रीब उतना ही ग़रीब है जितना पहले था
फर्स्ट लेवल के अमीर और भी अमीर हो गए हैं
कहीं कुछ बदला है तो बस
शासन-प्रशासन की सीटों पर तशरीफ़
गाड़ियों पर बत्तियों के रंग
कुछ लोगों के घरों और बैंक बैलेंस का साइज़
और हाँ..पाँच सौ का नोट भी

आदमी

भले हैं सब गाड़ियों पे
पर अक्ल से पैदल है आदमी
भीड़ भरे चौराहों पर
सहमा सा चलता है आदमी
ज़िन्दगी में भागता है ऐसे
जैसे घोड़ा हो गया है आदमी

मुम्बई की बारिश

कल रात से बारिश हो रही है
बहुत तेज़
लगातार...
जब हाँफने लगती है
तो थोड़ा मंद पड़ जाती है
फिर साँस भरकर
बरसने लगती है तेज़ी से..
जुलाई आधी बीत गयी है
बारिश को शायद
अहसास हो गया है
कि ये उसका ही मौसम है
और बरसने की ड्यूटी
अब शिद्दत से करनी पड़ेगी

घिसा-पिटा सब्जेक्ट

बारिश...
बहुत घिसा-पिटा सबजेक्ट है
लिखने के लिए
एक लड़की भीगी-भागी से लेकर
सावन आया-आया है तक
हिन्दी फिल्मों के पच्चीस गाने
पर्दे पर बारिश करके जा चुके हैं
इसलिए खाली वक़्त में जब बारिश
ख़ुदको गूगल करती होगी
तब बेशक़ थोड़ा इतराती होगी
जैसे मेरी कुछ दोस्त
मेरी नज़्मों को
ख़ुद से इंस्पायर्ड बताकर इतराती हैं
और थोड़ा बुरा भी लगता होगा उसे
न्यूज़ सेक्शन पढ़कर
जब देखती होगी
कि सूखा पीड़ित किसान को
मुआवज़ा मिला सिर्फ़ चालीस पैसा!
फिर कभी पछताती भी होगी
जब पता चलता होगा कि
बाढ़ में कैसे बह गया पूरा शहर
चीन वालों पे तो अच्छा-ख़ासा गुस्सा आता होगा
जब पढ़ती होगी कैसे
बारिश को ओलम्पिक खेलने से रोका था
और अपनी हमशक़्ल
आर्टीफीशियल रेन के बारे में पढ़कर तो
पेट पकड़-पकड़के हँसती होगी
हालाँकि तस्वीरों वाले सेक्शन में जब उसे
ख़ुदके प्रोस एंड कॉन्स दिखते होंगे
तब ज़रूर मिक्स फ़ीलिंग से भर जाती होगी
बस एक बात के बारे में पता नहीं है
कि अपने बारे में इतना कुछ पढ़कर
उसे ऊब होती होगी या अच्छा लगता होगा?
ख़ैर जो भी हो
पर आपको नहीं लगता
कि बारिश बहुत घिसा-पिटा सबजेक्ट है
लिखने के लिए!

Over Confidence

ख़ोखला हो भी जाऊँ
तो भी राख होने तक
उड़ता रहूँगा आसमाँ में
सुना है हौसला
इन्साँ को सम्भाले रखता है

शीर्षक अंत में है

धूप के भी क्या तेवर हैं
कभी बहुत तीखे
कभी नरम
तो कभी कुनकुने
कभी-कभी तो लगता है
कि ये धूप न होती
तो इत्मीनान से दिन-दोपहर
कहीं भी घूम-फिर लेते
पर साइंस कहता है कि
धूप तो लाइफ़ का विटामिन D है
उसके बिना तो मज़बूती से
खड़े हो पाना भी मुश्किल है
हालाँकि धूप का तुमसे कोई स्वार्थ नहीं है
रत्ती भर का भी नहीं
फिर भी धूप
ज़रूरी और गैर-ज़रूरी वक़्त पर
साथ होती है
और जब नहीं होती है
तो उसकी कमी महसूस होती है
पिता के तेवर भी धूप जैसे ही हैं
जो कितना कुछ देता है हमें
लेकिन उसका स्वार्थ बस इतना है
कि उसे तुम्हारी ज़िन्दगी
छाँव से भरी चाहिए...

धूप के भी क्या तेवर हैं..हैं न?


#SaluteToAllFathers
#HappyFathersDay


"पिता"

Dear Madam

Dear Madam,मैं आज भी आपकी तस्वीर देखकर हँस देता हूँ
ये सोचकर कि उस वक़्त
जब इश्क़ जैसी राहत
मेरी समझ से बाहर थी
न जाने आपको देखकर
कैसे इक बार में ही समझ आ गई
मैंने कभी आपसे कुछ भी नहीं कहा था
और आपको भी मेरी सारी बातें
न जाने कैसे समझ आ गईं
फिर भी ये समझ किसी काम न आई
क्योंकि हम दोनों ही
दुनिया की समझ से बाहर जो हो गए थे...
ख़ैर, जो भी हुआ
उसमें हमने
हम दोनों के अलावा भी
बहुत कुछ खो दिया था
जैसे मैंने आपका भरोसा
और आपने अपनापन
मुझे नहीं पता कि ज़िन्दगी में
बहुत कुछ हासिल कर भी लिया तो
क्या दुबारा ये हासिल कर पाउँगा
जो कुछ थोड़ा सा
पहले कभी खो दिया है?आपको क्या लगता है
बताना ज़रूर Yours
Stupid StudentP.S. सर से कहना कि मेरे टेस्ट पर सवाल न उठाएँ.. मैं तब भी बच्चा नहीं था और अब भी नहीं हूँ।

कॉन्डम

बहुत बदनाम हूँ उस गली के गुंडे से भी ज़्यादा जो आती-जाती हर लड़की को अपने साथ सुलाना चाहता है उस करप्ट लीडर से भी ज़्यादा जिसने ग़रीबों का राशन खाया है लेकिन इतना बदनाम होने के बाद भी जो बात मुझमें अच्छी है वो ये कि कि खड़े पे सिर्फ मैं काम आता हूँ फिर भी समझ नहीं आता कि लोग दबी ज़ुबान में ही मेरा नाम क्यूँ  लेते हैं.. इतना ख़राब भी नहीं है जिसने भी रखा है मेरा नाम कॉन्डम..


क्या हुआ शर्मा गए..??

शेष

हर बार जाता हूँ जब
तो छूट सा जाता हूँ कहीं
जैसे ट्रेन जाने के बाद
छूट जाते संगी-साथी प्लेटफ़ॉर्म में
और मेरी आँखों में रह जाती है
उनकी सूरत
कानों में उनकी खिलखिलाहट
ऐसा कुछ उनकी आँखों में भी
मेरा कुछ छूट तो जाता होगा।

कुछ मिला क्या?

चित्र
ढूँढो कुछ, हाथ कुछ और लगता है
ये मामला बड़ा पेंचीदा सा लगता है

हैसियत

चित्र
हमारी हैसियत का अंदाज़ा
कोई इस बात से लगा ले
कि अपनी बर्बादियों की सालगिरह भी
हम बड़ी धूम-धाम से मनाते हैं.

मेरी ख़ामोशी

जिसके पास कहने को बहुत होता है,
वो अक्सर किसी कोने में चुप सा,
छुपा सा बैठा होता है,
शायद ये सोचकर,
कि इसी में सबकी भलाई है।

मरीचिका

चित्र
इस 01:01 की तरह
किसी के साथ होकर
तू भी अकेला सा ही है
मेरी तरह

कीमती वक़्त - 2

चित्र
सुनो
कुछ वक़्त
मेरे लिए भी ख़रीद लो
बाद में थोड़ा-थोड़ा करके
चुका दूँगा
वक़्त भी
और कीमत भी

राय

कुछ लोग अपनी फ़ितरत बदलते हैं हर दिन
यूँ किसी के बारे में इक राय बनाना नहीं अच्छा!

मुलाक़ात

इक वो मुलाक़ात बड़े वक़्त से ठहरी हुई है
इक ये वक़्त है जो कमबख्त़ ठहरता नहीं।

कीमती वक़्त

चित्र
तुम्हारी घड़ी तो बहुत महँगी है
फिर भी तुम्हारे पास मेरे लिए
वक़्त नहीं है!


सच

चित्र
जो दिल में है गर वो ज़ुबाँ तक आ जाएगा
सुनने वालों का कलेजा मुँह तक आ जाएगा

यूँ ही जो दम भरते हैं अपनी दरियादिली का
वो दरिया छलक कर गलियों तक आ जाएगा

जिनकी सियासी चालों से रियासत में है हलचल
पत्थर उछलकर उनकी खिड़की तक आ जाएगा

जिसने लगाई है जंगल में ख़बर आग की तरह
वो धुआँ उड़कर उसके शहर तक आ जाएगा

सुना है कि कलयुग में भी आएगा कोई अवतार
लगता नहीं कि क़यामत से पहले तक आ जाएगा

साहिबा

चित्र
तमाम उम्र की दोस्ती लेके वादे में
तन्हाईयों से राबता मेरा करा गया
जो शख्स़ दिखता था चाँद में पहले
जाने गुम कहाँ बादलों में हो गया।

नाम-बदनाम

एक मैं ही नासमझ निकला दयार-ए-यार में,
कम से कम बाज़ार में इसकी तो दाद मिले।

"बूमरैंग"

(तीसरी किश्त)

उसने उस लड़की को मल्टीप्लेक्स के बाहर ड्राप कर दिया। न तो उस लड़की ने उसे फ़िल्म देखने के लिए पूछा और न ही उसने देखने की इच्छा जताई। वो वापिस घर आ गया। शाम को घर पर उसकी मम्मी किसी लड़की की बात कर रहीं थी जो उसी मल्टीप्लेक्स में उनके आगे वाली कतार में बैठी थी। जिसके कान में तीन-चार एअरिंग्स थे और जो अकेले ही आयी थी और अकेले ही चली गयी। उनके मुताबिक़ वो हू-ब-हू उतनी ही ख़ूबसूरत थी जितनी कि वो लड़की, जिससे वो आज मिला था। थोड़ी देर में ये भी पक्का हो गया कि मम्मी भी उसी लड़की की बात कर रही थीं, जिससे वो आज मिला था। वो मन ही मन अपनी खैर मना रहा था कि अच्छा हुआ वो उसके साथ फ़िल्म देखने नहीं गया। अगले दिन वो घर पर ही था, मुम्बई से लौटे हुए उसको 5-6 महीने हो चुके थे। इस शहर में जहाँ कल तक उसका मन नहीं लगता था वहाँ आज उसका दिल लग गया था। शाम होते-होते उसके पास फ़ोन आया कि क्या वो घड़ी की शॉप तक चल सकता है। वो फ़टाफ़ट तैयार हुआ और पहुँच गया उसे लेने लेकिन तब तक वो रिक्शा लेकर निकल चुकी थी। फिर भी अपनी बाइक दौड़ाते हुए उसने उसे रास्ते में ही रिक्शा से उतारकर बाइक पर बैठा लिया। वो बैठ तो गयी थी …

बूमरैंग

(दूसरी किश्त)

सितम्बर की दोपहर थी, हल्की सी धूप कॉफ़ी हाउस के काँच वाले दरवाज़े से अन्दर जा रही है। वहीं एकदम सामने की टेबल पर वो उसका इंतज़ार कर रही थी। दोनों को एक-दूसरे को पहचानने में कोई मुश्किल नहीं हुई। उस लड़की ने उसे मुस्कुराकर देखा और उसने भी मुस्कराहट से उसका जवाब दिया। वो उसी टेबल पर उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। कुछ ही पल बीतते ही वो लड़की थोड़ा असहज हो गयी। बड़ी हड़बड़ी में उसने खाने के लिए कटलेट और साथ में कॉफ़ी का ऑर्डर दिया। मुस्कराहट से शुरू हुआ माहौल भारत-पाक शान्ति वार्ता जैसा लगने लगा। थोड़ी देर में ऑर्डर टेबल पर लग गया। हमेशा छुरी-काँटे का इस्तेमाल करने वाली लड़की उस दिन हाथ से कटलेट खा रही थी, मिलने का वादा था चाय पर और कॉफ़ी पी रही थी। उसके बाद उसने कोल्ड ड्रिंक भी ऑर्डर की, उसकी तली का नारंगी निशान भी सफ़ेद टेबल पर पड़ गया था। जिसे बाद में शायद वेटर ने मिटा दिया होगा लेकिन वहाँ से जाने के बाद भी वो दोनों उस मुलाक़ात को मरते दम तक शायद नहीं भूल पायेंगे। हालाँकि उस दिन दोनों ने ज़्यादा बात नहीं की, वो लड़का उसे एकटक देख रहा था। वो लड़की थोड़ा पॉवर वाला चश्मा लगाए बैठी थी।  कान…

बूमरैंग

(पहली किश्त)

पहली बार जब वो उस लड़की से मिला था तो उसके दिमाग में नारा गूँज रहा था "अभी तो ये अँगड़ाई है, आगे और लड़ाई है"। उस दिन दोनों एक-दूसरे के सामने आये भी थे लेकिन उससे पहले कभी एक-दूसरे से मिले नहीं थे। वैसे मिले तो उस दिन भी नहीं थे जब उसने काग़ज़ आगे कर दिया और वो उसे एप्लीकेशन की शक्ल देकर स्टूडेंट्स की माँगे लिखती गयी। उस वक़्त वो मानवाधिकार कार्यकर्ता के तौर पर काम कर रहा था। उस दिन वो मीडिया के साथ उस लड़की के कॉलेज पहुँचा और वहाँ के स्टूडेंट्स की परीक्षाओं में होती लेट-लातीफ़ी के लिए डीन से लिखित में सवाल-जवाब कर रहा था। वहाँ हो रही अव्यवस्था की जानकारी उसे अपने मित्र से प्राप्त हुई थी। ये बात आई-गई हो गयी और उस दिन के कई सालों बाद भी उन दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई। कुछ साल बीतने के बाद फ़ेसबुक अस्तित्त्व में आ गया। और किसी पुरानी जान-पहचान की ख़ातिर बस वहीं टकरा गए। वहाँ शुरू हुआ शेरो-शायरी पोस्ट करने का दौर और फिर लाइक-कमेन्ट का सिलसिला। एक बार जब जान-पहचान बढ़ने लगती है तो फिर लगता है कि क्यूँ न थोड़ा और-थोड़ा और जान लिया जाए। ऐसे ही एक दिन पता चला दोनों का चाय से बे…