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January, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

"बूमरैंग"

(तीसरी किश्त)

उसने उस लड़की को मल्टीप्लेक्स के बाहर ड्राप कर दिया। न तो उस लड़की ने उसे फ़िल्म देखने के लिए पूछा और न ही उसने देखने की इच्छा जताई। वो वापिस घर आ गया। शाम को घर पर उसकी मम्मी किसी लड़की की बात कर रहीं थी जो उसी मल्टीप्लेक्स में उनके आगे वाली कतार में बैठी थी। जिसके कान में तीन-चार एअरिंग्स थे और जो अकेले ही आयी थी और अकेले ही चली गयी। उनके मुताबिक़ वो हू-ब-हू उतनी ही ख़ूबसूरत थी जितनी कि वो लड़की, जिससे वो आज मिला था। थोड़ी देर में ये भी पक्का हो गया कि मम्मी भी उसी लड़की की बात कर रही थीं, जिससे वो आज मिला था। वो मन ही मन अपनी खैर मना रहा था कि अच्छा हुआ वो उसके साथ फ़िल्म देखने नहीं गया। अगले दिन वो घर पर ही था, मुम्बई से लौटे हुए उसको 5-6 महीने हो चुके थे। इस शहर में जहाँ कल तक उसका मन नहीं लगता था वहाँ आज उसका दिल लग गया था। शाम होते-होते उसके पास फ़ोन आया कि क्या वो घड़ी की शॉप तक चल सकता है। वो फ़टाफ़ट तैयार हुआ और पहुँच गया उसे लेने लेकिन तब तक वो रिक्शा लेकर निकल चुकी थी। फिर भी अपनी बाइक दौड़ाते हुए उसने उसे रास्ते में ही रिक्शा से उतारकर बाइक पर बैठा लिया। वो बैठ तो गयी थी …

बूमरैंग

(दूसरी किश्त)

सितम्बर की दोपहर थी, हल्की सी धूप कॉफ़ी हाउस के काँच वाले दरवाज़े से अन्दर जा रही है। वहीं एकदम सामने की टेबल पर वो उसका इंतज़ार कर रही थी। दोनों को एक-दूसरे को पहचानने में कोई मुश्किल नहीं हुई। उस लड़की ने उसे मुस्कुराकर देखा और उसने भी मुस्कराहट से उसका जवाब दिया। वो उसी टेबल पर उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। कुछ ही पल बीतते ही वो लड़की थोड़ा असहज हो गयी। बड़ी हड़बड़ी में उसने खाने के लिए कटलेट और साथ में कॉफ़ी का ऑर्डर दिया। मुस्कराहट से शुरू हुआ माहौल भारत-पाक शान्ति वार्ता जैसा लगने लगा। थोड़ी देर में ऑर्डर टेबल पर लग गया। हमेशा छुरी-काँटे का इस्तेमाल करने वाली लड़की उस दिन हाथ से कटलेट खा रही थी, मिलने का वादा था चाय पर और कॉफ़ी पी रही थी। उसके बाद उसने कोल्ड ड्रिंक भी ऑर्डर की, उसकी तली का नारंगी निशान भी सफ़ेद टेबल पर पड़ गया था। जिसे बाद में शायद वेटर ने मिटा दिया होगा लेकिन वहाँ से जाने के बाद भी वो दोनों उस मुलाक़ात को मरते दम तक शायद नहीं भूल पायेंगे। हालाँकि उस दिन दोनों ने ज़्यादा बात नहीं की, वो लड़का उसे एकटक देख रहा था। वो लड़की थोड़ा पॉवर वाला चश्मा लगाए बैठी थी।  कान…

बूमरैंग

(पहली किश्त)

पहली बार जब वो उस लड़की से मिला था तो उसके दिमाग में नारा गूँज रहा था "अभी तो ये अँगड़ाई है, आगे और लड़ाई है"। उस दिन दोनों एक-दूसरे के सामने आये भी थे लेकिन उससे पहले कभी एक-दूसरे से मिले नहीं थे। वैसे मिले तो उस दिन भी नहीं थे जब उसने काग़ज़ आगे कर दिया और वो उसे एप्लीकेशन की शक्ल देकर स्टूडेंट्स की माँगे लिखती गयी। उस वक़्त वो मानवाधिकार कार्यकर्ता के तौर पर काम कर रहा था। उस दिन वो मीडिया के साथ उस लड़की के कॉलेज पहुँचा और वहाँ के स्टूडेंट्स की परीक्षाओं में होती लेट-लातीफ़ी के लिए डीन से लिखित में सवाल-जवाब कर रहा था। वहाँ हो रही अव्यवस्था की जानकारी उसे अपने मित्र से प्राप्त हुई थी। ये बात आई-गई हो गयी और उस दिन के कई सालों बाद भी उन दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई। कुछ साल बीतने के बाद फ़ेसबुक अस्तित्त्व में आ गया। और किसी पुरानी जान-पहचान की ख़ातिर बस वहीं टकरा गए। वहाँ शुरू हुआ शेरो-शायरी पोस्ट करने का दौर और फिर लाइक-कमेन्ट का सिलसिला। एक बार जब जान-पहचान बढ़ने लगती है तो फिर लगता है कि क्यूँ न थोड़ा और-थोड़ा और जान लिया जाए। ऐसे ही एक दिन पता चला दोनों का चाय से बे…