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Hindi Poetry performance at Rangrez Toli

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1. दिन में आशिक़ी रात को काम करता हूँ
पागल हूँ बे सिर पैर के काम करता हूँ 
2. तुमसे कहजाने को क्या-क्या राग लगा के बैठा हूँ  दिल की आवारा गलियों में रात बिछा के बैठा हूँ

बिखरे ख़याल

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तुमसे बात करने के बाद
एक रख दिया था खिड़की के पास
कुछ को बुकशेल्फ़
दो-चार को फ़्रिज के ऊपर
और एक-आध टांग दिया था
कीरिंग लटकाने वाले कील पर
तुम्हीं ने कहा था अपना ख़याल रखना
सो जो जहाँ आता है
उसे वहीं रख देता हूँ
तुम आओ तो इन्हें बटोर के ले जाना
इधर-उधर हो गए तो बड़ी फ़जीहत हो जायेगी..

तुमसे बात करने के बाद
एक रख दिया था खिड़की के पास

प्यार बिन बुलाये कैंसर की तरह है!

प्यार बिना बुलाया कैंसर नहीं है। पहली बात ये कैंसर नहीं है। कैंसर फिर भी इंसान को जीना सीखा सकता है और इंसान जीता है ये जानते हुए कि वो मौत के रास्ते पर जा रहा है। प्यार की गली ये नहीं बताती कि उसका मुँह जहाँ खुलेगा वहाँ ज़िन्दगी मिलेगी या मौत। ये अंधी गली है। जहाँ आगे मौत भी है और ज़िन्दगी भी। प्रेम भाव में आप सबको गले लगा भी लेते हो, अब वो ज़िन्दगी हो या मौत। इस अंधी गली में जाना है तो पहले मन की आँखें ख़ोज लो, वो अँधेरे में भी देख सकती हैं। लेकिन उसे खोजने के लिए तुम्हें ख़ुदको देखना पड़ेगा अंदर से, वो तुमसे होगा नहीं। क्यूँकि तुम्हें इसके लिए पहले ख़ुदको बाहर से जानना होगा। बिना बाहर से जाने तुम अंदर जा ही नहीं सकते। ये जो शरीर है जो नष्ट हो जाएगा, दिन-ब-दिन क्षीण हो रहा है। क़तरा-क़तरा झड़ रहा है। ये क्या है? ये जिसके साथ तुम रात-दिन सो रहे हो, नहा रहे हो, पोषण दे रहे हो, सजा रहे हो, ये शरीर है। इसके व्यवहार करने की सीमा है और एक एक्सपायरी डेट है। जब तक है तब तक उपयोग-दुरुपयोग तुम्हारे हाथ में है। जैसा चाहे कर लो क्योंकि जब ये नष्ट हो जाएगा तब कोई तुमसे ये प्रश्न नहीं पूछेगा कि शरीर था तब…

असहिष्णुता

हिन्दू की बस्ती में मुसलमान डरा हुआ है
मज़हब की बस्ती में ईमान डरा हुआ है
शक़, फ़रेब और सियासत के चलते
हिंदुस्तान की धरती में इंसान डरा हुआ है।

पिता

पिता यूनिवर्स की तरह है
उसके भीतर की गहराई नापना
मुमकिन ही नहीं है
यूनिवर्स की तरह ही
वो अपने दामन में
सूरज की गर्मी, यूरेनस की सर्दी
जूपीटर के तूफ़ान और जाने कितने राज़
दबाए रखता है
पिता के रहते
सब अपनी-अपनी धुरी पर घूमते हैं
अपनी कक्षा में ही चक्कर लगाते हैं
कोई किसी से नहीं टकराता
और बिग-बैंग थ्योरी की तरह
पिता की पनाह में
सबका विस्तार जारी रहता है
भले ही रिलेटिविटी की थ्योरी
जनरेशन में टाइम डिफरेंस पैदा कर देती हो
लेकिन तमाम असमानताओं के बावजूद
पिता सबका बराबरी से ख़याल रखता है
क्योंकि उसकी नज़र में
सब उसकी ही ज़िम्मेदारी हैं.
पिता यूनिवर्स की तरह है...

विरोध के स्वर

आप अराजकता की बात करते हैं,
मैं सुधार की कोशिश करता हूँ,
आप शायद डरते हैं सरकार से
मैं डर का तिरस्कार करता हूँ,
आप जीते हैं आँख बचाकर सत्य से
मैं सत्य से दो-दो हाथ करता हूँ
आप बचते रहते हैं समस्याओं से
मैं उनका प्रतिकार करता हूँ
आप चाहते हैं सिर्फ़ बात छेड़ना
मैं युद्ध के लिए ललकारता हूँ
आप चाहते हैं मसीहा कलयुग में
मैं मसीहों का निर्माण करता हूँ

तुम चाहो या न चाहो

जब तक मैं इस धरती पर हूँ
तुम चाहो या न चाहो
माँगो या न माँगो
मैं फिर भी
अपने ज़िंदा होने के सबूत
तुम्हें देता रहूँगा
कभी अन्याय के ख़िलाफ़ लड़कर
कभी किसी का झूठ झूठ साबित कर
कभी किसी से प्रेम कर
कभी किसी की आवाज़ बनकर
कभी हवा के विपरीत चलकर
कभी सूर्य से पहले उठकर
कभी रात भर जागकर
कभी कविता लिखकर
कभी कोई गीत गाकर
कभी नदी पारकर
कभी पहाड़ चढ़कर
कभी सबके लिए जीकर
कभी सबके लिए मरकर

तुम चाहो या न चाहो
माँगो या न माँगो
मैं फिर भी
अपने ज़िंदा होने के सबूत
तुम्हें देता रहूँगा

अंतिम इच्छा

कभी खो भी जाऊँ तो
मिल जाऊँगा थोड़ा-थोड़ा करके
किसी की यादों में
किसी पुराने अखबार की कतरन में
किसी के ई मेल या मोबाइल पर
किसी तस्वीर में
किसी के किस्सों में
तब वहाँ से मुझे उठाकर
तुम मिट्टी में दबा देना
कुछ दिन बाद
धूप और पानी खाकर
मैं फिर से
साबुत बाहर आऊँगा
फिर मैं तुम्हें ढूँढ लूँगा
जैसे तुमने मुझे ढूँढा था

मिलना

सिर्फ़ आमने-सामने बैठने को
और बैठकर बात करने को
मिलना नहीं कहते
मिलने के लिए बहुत ज़रूरी है
आत्मसमर्पण कर देना
जैसा अपराधी करते हैं
सारे हथियार डालकर
निहत्थे हो जाना
बिल्कुल वैसा
अपने एक-एक गुनाह को
कबूल करना
जो हमने कभी किये थे
अपने
हाथों
आँखों
और विचारों से।


जाते-जाते

उसने पूछा - सीधे घर जाओगे?
मैंने कहा - मेरे घर के रास्ते पे पहले मयकदा पड़ता है, फिर बुतख़ाना, फिर दोस्त का घर, फिर अहाता और फिर मेरा घर।
वो हँसते हुए चली गयी और मैं अब तक घर नहीं पहुँच पाया।

लघु कथा - Offline

लगभग तीन दिन हुए थे, सबकुछ ठीक चल रहा था। सबकुछ से मेरा तात्पर्य है कि उसका मुझे देखना, मेरा उसे देखना और दोनों का एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराना। एक सामान्य व्यक्ति के लिये सबकुछ की परिभाषा लगभग यही होती है। इसके बाद थोड़ी बातचीत भी शुरू हो गयी। फिर तीसरा दिन ख़त्म होते-होते उसने संकोच करते हुए व्हाट्स एप पर पूछ लिया कि आपकी उम्र कितनी है? मैंने प्रॉपर डेट ऑफ़ बर्थ के साथ उसे जवाब भेज दिया। तब से वो ऑफलाइन है।

संसार

ये पौधे
ये पेड़
कंकड़
पत्थर
माटी की बामी
आसमान
सब भाग रहे हैं
एक बुद्ध की तलाश में
खुद में एक-एक बुद्ध छुपाये।

ज़िन्दगी के नाम

Dear Zindgi

ज़िन्दगी तुझे तलाश करते-करते
न जाने कहाँ निकल आये हम
और कमबख्त तुम्हें फुरसत नहीं
व्हाट्स एप और एफ़बी से निकलने की

Yours truly
Chakresh Surya

कमीना

वो रो रही थी, उसकी सहेली ने रोने का कारण पूछा तो वो बोली कि "मैं जिसे चाहती हूँ वो मुझे नहीं चाहता।"
फिर?
वो कहता है कि वो सिर्फ़ मेरी Physical need पूरी कर सकता है, Emotional नहीं।
और ऐसा उसने फोन पर कहा?
हाँ।
ये लड़के होते ही कमीने हैं। फिर तुमने क्या कहा?
मैंने कहा कि मैं जिसके शादी करूँगी बस उसी के साथ ये सब करूँगी।
कुछ दिन बाद जब वो फिर से रोती हुई मिली तो उसकी सहेली ने फिर से कारण पूछा, क्या हुआ?
उसने शादी से मना कर दिया।
तो दुनिया ख़त्म हो गयी क्या? और उसने तो पहले ही कह दिया था कि वो सिर्फ़ तुम्हारी..(बीच में ही रोककर)
नहीं वो नहीं.. मुझे दूसरा लड़का पसंद आया। फोन पर बोला कि तुमसे ही शादी करूँगा तो मैं उससे मिलने चली गयी। उसके घर पर भी रुकी थी। अब फोन पर कह रहा है कि घरवाले नहीं मानेंगे।
तो अब क्या?
मुझे लगता है जो लड़के वाक़ई में कमीने होते हैं वो अपना कमीनापन काण्ड करने के बाद दिखाते हैं।

Handsome लड़का

एक लड़के को डेट कर रहे थे, पहली बार मिल रहे थे ICH में। डोसा आर्डर करके दोनों खाने लगे। फ़र्क इतना था कि हम हाथ से खा रहे थे और वो छुरी-काँटे से। फिर क्या था, लड़कपने में लड़के ने सवाल दाग़ दिया, आप हाथ से? छुरी-काँटे से नहीं आता क्या? अब लौंडे ने जो बात लड़कपन में बोली थी हमने उसका जवाब हँसते हुए दे दिया कि "आता तो है लेकिन हम इस तरह से right hand में fork और left hand में kinfe नहीं पकड़ते। वो उसके साथ हमारी पहली और आख़िरी डेट थी। अब ये बात समझ नहीं आती कि उसको बुरा क्या लगा? हमारी हँसी या हमारा जवाब? वैसे इतना बुरा तो नहीं हँसते हम... है न? हालाँकि थोड़ा दुःख होता है जब सोचते हैं तो क्योंकि वो काफ़ी handsome था।

P.s. लौंडे, तुम जो भी हो वापिस आ जाओ, तुमको दुबारा से छुरी-काँटा ग़लत पकड़ने पर कोई कुछ नहीं बोलेगा।

Chakresh Surya_Youth Poet Jabalpur_Rangrez Toli

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आदमी

धुले कपड़े पहने सभ्य होने का दावा करता है
पर गिरी सोच को उठा नहीं पाता "आदमी"

सोचा कि आज हद से ज़्यादा गन्दा लिखूँ
इसलिए काग़ज़ पे लिख दिया "आदमी"