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विरोध के स्वर

आप अराजकता की बात करते हैं,
मैं सुधार की कोशिश करता हूँ,
आप शायद डरते हैं सरकार से
मैं डर का तिरस्कार करता हूँ,
आप जीते हैं आँख बचाकर सत्य से
मैं सत्य से दो-दो हाथ करता हूँ
आप बचते रहते हैं समस्याओं से
मैं उनका प्रतिकार करता हूँ
आप चाहते हैं सिर्फ़ बात छेड़ना
मैं युद्ध के लिए ललकारता हूँ
आप चाहते हैं मसीहा कलयुग में
मैं मसीहों का निर्माण करता हूँ

तुम चाहो या न चाहो

जब तक मैं इस धरती पर हूँ
तुम चाहो या न चाहो
माँगो या न माँगो
मैं फिर भी
अपने ज़िंदा होने के सबूत
तुम्हें देता रहूँगा
कभी अन्याय के ख़िलाफ़ लड़कर
कभी किसी का झूठ झूठ साबित कर
कभी किसी से प्रेम कर
कभी किसी की आवाज़ बनकर
कभी हवा के विपरीत चलकर
कभी सूर्य से पहले उठकर
कभी रात भर जागकर
कभी कविता लिखकर
कभी कोई गीत गाकर
कभी नदी पारकर
कभी पहाड़ चढ़कर
कभी सबके लिए जीकर
कभी सबके लिए मरकर

तुम चाहो या न चाहो
माँगो या न माँगो
मैं फिर भी
अपने ज़िंदा होने के सबूत
तुम्हें देता रहूँगा

अंतिम इच्छा

कभी खो भी जाऊँ तो
मिल जाऊँगा थोड़ा-थोड़ा करके
किसी की यादों में
किसी पुराने अखबार की कतरन में
किसी के ई मेल या मोबाइल पर
किसी तस्वीर में
किसी के किस्सों में
तब वहाँ से मुझे उठाकर
तुम मिट्टी में दबा देना
कुछ दिन बाद
धूप और पानी खाकर
मैं फिर से
साबुत बाहर आऊँगा
फिर मैं तुम्हें ढूँढ लूँगा
जैसे तुमने मुझे ढूँढा था